ड़ीएसपी दविंदर का विश्वासघात

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कश्मीर घाटी में दो आतंकवादियों के साथ गिरफ्तार ड़ीएसपी दविंदर सिंह की भूमिका को लेकर देश की सुरक्षा से सम्बंधित गंभीर सवाल खड़़े हो गए हैं। कहा जा रहा है कि हालात कितने भी काबू में क्यों न हों लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति आज भी संवेदनशील है। ये क्यों है, इसका जवाब राज्य पुलिस के डीएसपी की गिरफ्तारी से मिल जाता है। गिरफ्तारी यदि किसी मामूली मामले में हुई होती तो भी कुछ हद तक ठीक था क्योंकि तब माना जा सकता था कि इन्सान गुमराह हो गया था लेकिन अब जिस तरह की खबरें डीएसपी देविंदर सिंह के बारे में आ रही हैं, वह यह तस्दीक करती हैं कि राज्य से हरसम्भव सीमा तक खदेड़े जाने के बाद भी आतंकी अपनी पैठ जमाने की तमाम कोशिशें कर रहे हैं।

विडम्बना यह है कि उनके इस काम में हमारे अपने विश्वसनीय माने जाने वाले लोग भी मददगार हैं। राज्य की पुलिस के अनेक अधिकारियों एवं जवानों ने आतंक के खिलाफ जंग में बेमिसाल कुर्बानियां दी हैं जिन पर पूरे देश को गर्व है। वीरता के इन कदमों ने राज्य से आतंकवादियों-अलगाववादियों को खदेड़ने के सम्मिलित प्रयासों को गति थी। उनको सफल बनाया। अब इसको क्या कहा जाय कि उसी बल के कुछ लोगों को देशभक्ति और वीरता की इन भावनाओं-जज्बों से कोई मतलब नहीं है। उनको मतलब है तो अपने लाभ से और इसी का फायदा देश के दुश्मन उठा रहे हैं।

इस व्यक्ति के बारे में अब तो शंका यह भी है कि वह सुरक्षाबलों की तैनाती तथा गुप्त ऑपरेशन के बारे में सूचनाएं लीक करता था। यही नहीं, अपने इस काम को आगे बढ़ाने के लिये उसने श्रीनगर में सेना के कैम्प के पास बने अपने बहुमंजिला घर में तीन आतंकियों को पनाह दे रखी थी। इस तरह की बातें सामने आने के बाद पूरे प्रकरण की गम्भीरता में किसी तरह का सन्देह नहीं रह जाता।

हालांकि ऐसे मामलों की निगरानी होती है लेकिन विश्वास को छलनी कर देने की हद तक जाने का दुस्साहस कुछ ही लोग कर पाते हैं। जरूरत इस बात की है कि देविंदर सिंह जैसे और लोग भी राज्य पुलिस में हों, जिसकी सम्भावना कम ही है, तो उनका पता लगाकर ऐसे लोगों को जमात को पूरी तरह से निष्क्रिय ही नहीं किया जाय बल्कि राज्य में ऐसे तत्वों का उन्मूलन किया जाय।

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