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    लोहड़ी: देश एक त्योहारों के रंग अनेक

    By January 13, 2020 Featured No Comments3 Mins Read
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    लोहड़ी हमारे देश के उत्तर भारत में मनाया जाने वाला एक प्रसिद्ध त्योहारों मे से एक है। यह पर्व मकर संक्रान्ति के ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार को हर्षोउल्लास के साथ मनाने की परम्परा है। यह पर्व विशेषतः पंजाबी एवं हरियाणवी लोग के मध्य बहुत उल्लास पूर्वक मनाये जाने की परम्परा हमारे देश के उत्तर भारत प्रान्त की हैं।

    इन दिनों पूरे देश में पतंगों का ताता लगा रहता हैं. पूरे देश में भिन्न-भिन्न मान्यताओं के साथ इन दिनों त्यौहार का आनंद लिया जाता हैं। लोहड़ी पौष माह की अंतिम रात को एवम मकर संक्राति की सुबह तक मनाया जाता हैं यह पर्व प्रति वर्ष मनाया जाता हैं। मौजूदा वर्ष 2020 में यह त्यौहार 13 जनवरी को मानाया जा रहा है।

    यह त्यौहार भारत देश की शान हैं. भारत देश के प्रत्येक प्रान्त के अपने कुछ विशेष पर्व त्यौहार होते हैं जिनमे से यह एक हैं।

    सामान्तः हमारे यहां पर मनाया जाने वाले त्यौहार प्रकृति में होने वाले परिवर्तन के साथ ही मनाये जाते हैं जैसे लोहड़ी में कहा जाता हैं कि इस दिन वर्ष की सबसे लम्बी अंतिम रात होती हैं इसके अगले दिन से धीरे-धीरे दिन के बढ़ने का क्रम की शुरुआत होती है, इस दिन खेतों में अनाज दलहने लहलहाने लगते हैं और मोसम खुशगवार लगने लगता हैं कियूंकि इस दिन से ठंड भी क्रमशः कामजोड पड़ने लगती है।

    हमारे धार्मिक ग्रंथों जैसे पुराणों के आधार पर इसे सती (पार्वती) जी के त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में उन्हें याद कर प्रतिवर्ष मनाया जाता हैं। एक प्रचलित कथानुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति भगवान शंकर का तिरस्कार कर अपने जामाता को उनके द्वरा किये जाने वाले यज्ञ में शामिल होने का आमंत्रण नही भेजा तो उनकी पुत्री देवी पार्वती ने अपनी आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था। इसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में प्रति वर्ष लोहड़ी पर्व के रूप में मनाये जाने की परम्परा हमारे देश मे हैं और इसी कारण हमारे घरों की विवाहित इस्त्रियाँ बेटीयों को इस दिन तोहफे दिये जाते हैं और भोजन पर अपने घर आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता हैं। इसी ख़ुशी में श्रृंगार का सामान भी सभी विवाहित महिलाओ में बाँटा जाता हैं।

    लोहड़ी के पीछे एक एतिहासिक कथा यह भी प्रचलित हैं कि इस पर्व को दुल्ला भट्टी के नाम से भी जाना जाता हैं. यह कथा अकबर बादशाह के शासनकाल की हैं उन दिनों हमारे देश मे दुल्ला भट्टी पंजाब प्रान्त के एक सरदार हुआ करते थे। उन्हें पंजाब के नायक भी कहा जाता था. उन दिनों “संदलबार” नामक एक जगह हमारे देश था, जो मौजुदा समय में पाकिस्तान का एक हिस्सा हैं। वहाँ लड़कियों का एक बाजार लगता था, दुल्ला भट्टी ने इसका विरोध किया और लड़कियों को सम्मानपूर्वक इस दुष्कर्म से बचाया और उनकी शादी करवाकर उन्हें सम्मानित जीवन प्रदान किया।

    इस दिन को विजय दिन के रूप में लोहड़ी पर्व के रूप में मानते हुये इसे गीतों में ढाल कर गया बजाय जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं। लोहड़ी पर्व आने के कई दिनों पहले ही युवाओं के साथ ही घर के सभी बच्चे लोहड़ी के गीत गाते हैं. यह क्रम पन्द्रह दिनों पहले से ही प्रारम्भ हो कर दिया जाता हैं जिन्हें घर-घर जाकर भी गया बजाय जाता हैं। इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता हैं।

    • प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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