एक बार की बात है एक बड़ा महत्वकांछी राजा था। उसने छोटे-बड़े बहुत से राज्य जीते, चारों ओर उसकी जबरदस्त चर्चा थी मारे अहंकार के उसका दिमाग सातवें आसमान पर चला गया था। वह मानने लगा कि उसके मुकाबले का कोई भी राजा नहीं है।
एक बार की बात है वह छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर अपने देश को लौट रहा था। रास्ते में एक गांव पड़ा वहां उसने देखा कि एक साधु अपनी कुटिया के पास बैठा मस्ती से गा रहा है। उसकी मस्ती को देखकर राजा वहां रुक गया। उसने साधु से पूछा -तुम कौन हो?

साधु ने कहा राजा!
राजा ने यह सुनकर सोचा कि शायद साधु ने उसके सवाल को ठीक से सुना नहीं! उसने साधु से फिर पूछा -तुम कौन हो?
साधु ने फिर कहा राजा!
राजा ने सोचा कहां फकीर और कहां राजा! एक बार उसने फिर अपने सवाल को दोहराया- ‘तुम कौन हो?’
उत्तर वही मिला। राजा ने कहा- राजा के पास तो राज्य और खजाना होता है, तुम्हारा राज और खजाना कहां है? साधु ने राजा की ओर देखा फिर बोला -‘देखो मैंने अपने मन को जीत लिया है। इसलिए मेरा मन मेरा राज्य है। ओर जहां तक खजाने की बात है, प्रकृति ने चारों और खजाना ही खजाना फैला रखा है। वह सब मेरा ही तो है। राजा सोच में पद गया फिर उसने अपनेआप से कहा कि उसका कहना सही है!
राज्यों के जीतना आसान है, पर मन को जीतना कठिन है! इसलिए सच्चा राजा मैं नहीं यह साधु है। और उस दिन के बाद से राजा में परिवर्तन आ गया।







