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    कर्जमाफ़ी से क्या बदलेगें किसानों के हालात ?

    By January 15, 2020Updated:January 15, 2020 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 574

    National Issue: जी के चक्रवर्ती

    हमारे देश मे किसानों को दिया जाने वाला कर्ज और उसके बाद कर्ज माफी का सिलसिला एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या के रूप में उभर कर सामने आने से यह बात एक चिंता का विषय है। जहां एक तरफ तो हम किसानों के कर्ज माफ करते चले जा रहे हैं, लेकिन फिर भी देश के किसान की हालतों में किसी तरह की परिवर्तन दिखाई नही देता है आखिरकार इसकी बजह क्या है? यदि हम पिछले एक दशकों में देखे तो यह स्पष्ट झलकता है कि किसानों की दशा सुधारने के लिए जो कर्ज उन्हें मिला था उसे माफ कर देंना किसानों की हालतों में सुधार लाने के लिये कोई उपयुक्त रास्ता ढूंढने और उनको हमेशा के लिए आत्म निर्भर बनाने और इसका उपयुक्त व स्थायी समाधान निकलने की बजाय उनको सिलसिले वार कर्ज देते चले जाने से किसानों की समस्याएं ही दूर होने के स्थान पर और भी जटिल होती चली जा रही हैं, उल्टे गरीब किसान अपने आप को कर्ज के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर छटपटाने लगता है और ऐसे में उसके द्वारा कोई आत्मघाती कदम उठा लेना कोई आश्चर्य की बात नही है।

    इसके साथ ही साथ यह देश की अर्थव्यवस्था पर किस हद तक भारी पड़ता चला जा रहा है, इसका इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश मे पिछले एक दशकों में किसानों के लगभग पौने पांच लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिये गये थे। जिसमे से दो लाख करोड़ रुपए तो पिछले दो साल में माफ किए गये हैं। क्या यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय नहीं है? कि एक तरफ तो हम किसानों के कर्ज माफ करते जा रहे हैं, और दूसरी तरफ दिन प्रतिदिन किसानों की हालत पहले और भी अधिक सोचनीय होती चली जा रही है। ऐसे तो लगातार किसानों को कर्ज बांटते रहने और फिर उसे माफ कर देने का सिलसिला कभी न खत्म होने वाला चक्र लगातर आगे भी कायम रहेगा।

    अभी अभी किसानों की कर्ज माफी को लेकर देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआइ रिसर्च की ताजा रिपोर्ट की बात करें तो जिसमें यह बात स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि पिछले एक दशक में जो धनराशि किसानों के मध्य कर्ज माफी के रूप में बांटा गया, वह हमारे देश के उद्योग जगत में फंसे हुए कुल कर्ज यानी कि एनपीए का 82 प्रतिशत हिस्सा है। जाहिर सी बात है, कि यदि कुछ और वर्षों तक देश के किसानों को उनके कर्ज माफी का झुनझुना थमाया जाता रहा है तो देश के समक्ष एनपीए का एक बहुत बड़ा पहाड़ खड़ा हो जाएगा।

    farming

    वर्ष 2009 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2008 में देशभर के किसानों का कर्ज माफ़ी का फैसला किया था उस वक्त मनमोहन सरकार ने किसानों के 65 हजार करोड़ का कर्ज माफ किया था। मनमोहन सरकार द्वारा लिये गये इस फैसले का बड़ा लाभ कांग्रेस नेताओं ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में जमकर भुनाया था जिसके कारण एक बार केंद्र में कांग्रेस की सरकार पुनः स्थापित थी।

    वहीं वर्ष 1990 में प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने किसानों की कर्जमाफी का फैसला लेने से उस वक्त के तत्तकालीन केंद्र सरकार ने किसानों का 10,000 रुपये तक का कर्ज माफ किया था। हालांकि, किसानों की इस कर्ज माफी के फैसले से केंद्र सरकार पर दस हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा था, इसके बाद 1991 में जब लोकसभा चुनाव हुये तो केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो जाने से कांग्रेस की सरकार बनी थी।

    यदि हम पिछले दो वर्षों की बात करें तो आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों के कर्ज माफ होते चले आ रहे है लेकिन इसके स्थान पर यदि देश के कृषि क्षेत्र के लिए उचित नीतियां बनायी जाती और उसे लागू किया जाता तो आज भारत के करोड़ों किसान दयनीय हालत में नहीं होते और आत्महत्या करने के लिए मजबूर नहीं होते। कृषि कर्जमाफी के आंकड़े बतातें हैं कि पिछले वित्त वर्ष यानी वर्ष 2018-19 में कृषि कर्ज का एनपीए एक लाख करोड़ रुपए से ऊपर निकल गया था।

    बहरहाल, कभी किसी पार्टी को किसानों के कर्ज माफी के मुद्दे पर फायदा मिला है, तो कभी उनके वादे उनकी नैय्या पार लगाने में नाकाम भी रहे हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि कर्ज से परेशान किसान आज भी आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं। वर्ष 2010 से लेकर वर्ष 2015 तक इन 15 सालों के दरमियान देश के 2 लाख 34 हजार 642 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

    भले ही हमारे देश मे पार्टियां और सरकारें एक के बाद एक आती जाती रहे और देश की लगभग सभी पार्टियां किसानों के कर्ज माफ करने जौसे दावे और वादे करते चले आ रहे हों लेकिन देशभर के किसानों पर आज भी 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज बकाया तो है ही इसके साथ ही साथ देश के किसानों की हालात बद से बदत्तर होती चली जा रही है।

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