डॉ दिलीप अग्निहोत्री
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार सक्रिय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह परतंत्र भारत की दयनीय दशा देखकर व्यथित होते थे। वह स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए भी इस स्थिति पर गहन विचार करते थे। वह सोचते थे कि विश्व गुरु भारत को क्यों परतंत्र होना पड़ा। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सामाजित एकता और राष्ट्रीय गौरव की भावना जब कमजोर पड़ी, तभी विदेशी आक्रांताओं ने इसका लाभ उठाया। इस कारण डॉ हेडगेवार ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए उन्नीस सौ पच्चीस में विजय दशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। नौ दिन की शक्ति उपासना के बाद विजय दशमी आती है।
डॉ हेडगेवार का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था। वह समाज को संगठित, स्वाभिमानी और जागरूक बनना चाहते थे।
इस स्थापना दिवस पर नागपुर में मुख्य समारोह आयोजित होता है। जिसमें सर संघचालक का संबोद्धन होता है। इस बार भी इस परम्परा का निर्वाह हुआ। फिर यह सन्देश मिला कि देश को मजबूत बनाने वाले कार्यों से संघ को प्रसन्नता होती है। समाज को विभाजित करने या हिंसा के कार्यों की संघ सदैव निंदा करता है। संघ अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को विभाजनकरी मानता है, इसलिए उसकी समाप्ति को उचित माना। संघ हिंसा को गलत मानता है, इसलिए इसलिए लीन्चिंग को गलत बताया।
सरसंघ चलक मोहन भागवत ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाने के लिए मोदी सरकार सराहना की। सरकार के कदम को राष्ट्रहित में और जनभावनाओं के अनुकूल बताया।
पिछले दिनों पाकिस्तान ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संयुक्त राष्ट्र संघ में आलोचना की थी। वैसे पाकिस्तान जैसा आतंकी मुल्क किसी की आलोचना करे, तो समझ लेना चाहिए कि वह संगठन मानवता के हित में कार्य कर रहा है। मोहन भागवत ने इसी ओर इशारा किया। कहा कि अपने गलत काम छुपाने के लिए संघ को कोसना इमरान खान ने भी सीख लिया है। संघ सदैव शक्तिशाली भारत चाहता हस।इसलिए भारतीय सेना की तैयारी और सुरक्षा नीति के मोर्चे पर भी केंद्र सरकार कार्यों को प्रशंसनीय बताया। सरकार जनभावना के अनुरूप ही काम कर रही है। देश के विकास में बाधक तत्व हतोत्साहि हैं। सरकार ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुशलता का परिचय दिया है। स्थल सीमा और जल सीमाओं पर सुरक्षा सतर्कता पहले से अच्छी है।
आतंकवादियों को कठोरता से जबाब दिया गया। उग्रवादियों के आत्मसमर्पण की संख्या भी बढ़ी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की सोच परिवर्तन आया है। भारत आगे बढ़ रहा है। भारत विरोधी तत्व यह देख कर निराश है।
संघ को विचारधारा के अनुरूप मोहन भागवत ने सामाजिक समरसता पर बल दिया। कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में सद्भावना, संवाद तथा सहयोग रहना चाहिए। उन्होंने संविधान के प्रति भी सम्मान व्यक्त किया। कहा कि कानून व संविधान की मर्यादा में ही अपने मतों की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। संघ भारतीय संविधान और कानून का पालन करने वाला संगठन है।
संघ का नाम लिंचिंग की घटनाओं से जोड़ना अनुचित, निराधार और शरारतपूर्ण है। जबकि संघ के स्वयंसेवकों का ऐसी घटनाओं से कोई संबंध नहीं होता। लिंचिंग जैसा शब्द भारत का है ही नहीं क्योंकि भारत में ऐसा कुछ होता ही नहीं था। भारत की परंपरा उदारवादी रही है। कानून और व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन व हिंसा से सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है। यह देश की परंपरा और संविधान दोनों के प्रतिकूल है। कानून और संविधान की मर्यादा ही रहना चाहिए। इसी प्रकार न्याय व्यवस्था का पालन करना चाहिए। कुछ बातों का निर्णय न्यायालय से ही होता है। निर्णय कुछ भी हो आपस के सद्भाव को किसी प्रकार नुकसान नहीं होना चाहिए। स्पष्ट है कि संघ शक्तिशाली राष्ट्र और संगठित समाज की दिशा में कार्य कर रहा है। वह संविधान के दायरे में ही समस्याओं का समाधान चाहता है। सरसंघचालक के विजय दशमी उत्सव का यही सन्देश है।





