अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस (11 अक्टूबर) पर विशेष: समाजशास्त्री एवं समाजसेवियों ने रखी बेबाकी से बात
भाजपा की वर्तमान राज्य सरकार हो या केन्द्र की वर्तमान सरकार आधी आबादी और बालिकाओं के भविष्य को सुदृढ़ बनाने के लिए नि:संदेह कई अच्छे कार्य किये हैं लेकिन अभी समाज के मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। आज भी कुछ लोग बालिकाओं की अपेक्षा बालकों को ज्यादा तवज्जो देते हैं, जबकि हकीकत यह है कि बच्चियां आज बच्चों की अपेक्षा पिता की सेवा करने से लेकर व्यापार व नौकरियों में भी बच्चों की अपेक्षा आगे हैँ।
यह कहना है समाजशास्त्री व समाजसेवियों का। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस की थीम है मेरी आवाज, हमारा सामान भविष्य। 2012 से ही बालिकाओं की सुरक्षा के लिए हर वर्ष इस विशेष दिवस को पूरे विश्व में मनाया जाता है। बालिकाओं के भविष्य के विषय पर समाजशास्त्रियों ने अपनी बात बेबाकी से रखी।
बदलाव सरकारी स्तर पर नहीं सांस्कृतिक स्तर पर चाहिए :
इस संबंध में ईश्वर शरण डिग्री कालेज के समाजशास्त्र के प्रवक्ता डाक्टर विकास ने बताया कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो मोदी की केन्द्र सरकार ने बेटी बचाओ अभियान और बेटियों के लिए जिस तरह तमाम योजनाएं लेकर आई, उससे लगा कि बेटियों की स्थिति में सुधार होगा। बेटियां भी समाज में समान भाव से रह सकेंगी। निश्चय ही कुछ बदलाव भी देखने को मिले लेकिन जिस तरह से हाथरस व राजस्थान आदि जगहों पर घटनाएं घटी, उससे यही लग रहा है कि यह बदलाव सरकारी स्तर पर नहीं सांस्कृतिक स्तर पर करने की जरूरत है। इसके लिए लड़कों को भी संस्कृति की शिक्षा देने की जरूरत है। हर जगह महिला अध्ययन केन्द्र की तरह ही पुरूष अध्ययन केन्द्र खोलना चाहिए।
एक तरफ महिलाएं चांद को छू रही हैं?
वहीं बीबीएयू के प्रोफेसर मनीष कुमार वर्मा ने बताया कि वर्तमान में समाज दोहरे परिवेश में परिभ्रमण कर रहा है। एक तरफ महिलाएं चांद को छू रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ दकियानुसी विचारों के कारण हमारे बच्चियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिस तरह से शिक्षा का विकास हो रहा है, उससे लगता है कि आने वाले समय में बच्चियां प्रगति करेगी। पूरी संभावना है कि आने वाले दिनों में हम बच्चियों पर होने वाले अत्याचार पर सफलता प्राप्त करने में सफल होंगे।
हमें अपने विचारों को भी बदलना होगा:
वहीं समाजसेवी अजित सिंह का कहना है कि हमें जरूरत है संस्कृति के बदलाव की। हम लाख कानून बना लें, जब तक हम अपने बच्चों को सुसंस्कृत नहीं बनाएंगे, तब तक समाज में बच्चियों को बराबर का दर्जा नहीं मिल सकता। हमें अपने विचारों को भी बदलना होगा। कुछ इसी तरह की बातें समाजसेवी राकेश प्रधान, अतुल राय ने भी रखी।







