यह अपने प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अंदर बच्चों वाले पार्क में बना झरना नुमा फौव्वारा है। यह इस लिये था कि बच्चे खेलेंगे, झरने और फौव्वारे को देखकर उनका बालमन प्रफुल्लित होगा। इस पार्क के रख-रखाव में हमेशा काफी रुपया खर्च होता है, जो मात्र कागजों के जरिए अधिकारियों की जेबों तक जाता है।

दूसरी फोटो है, बच्चों के लिये बने स्लाइडर लेडर (फिसलने वाला) है। यह पार्क में कई लगे हैं जो अच्छा कार्य है। इसमें खराबी यह है कि बच्चे जितने उल्लास व उत्साह से नीचे आते हैं, उसी क्रम में नीचे आते ही चोटिल हो जाते हैं। नीचे मिट्टी रहनी चाहिए, परन्तु लगातार खेलने के क्रम में वहाँ से मिट्टी हट गयी है, जो नन्हें-मुन्नों को चोटिल करती है। देखरेख में जो चतुर्थ श्रेणी कर्मी हैं उनके व उनके बच्चों के लिये तो यह साधारण बात है। परेशानी होती है उन्हें जिनके घरों में थोड़ी सुविधा रहती है। यह कमी अधिकारियों को इस लिये नहीं दिखती, क्योंकि उनके अपने बच्चे ऐसे पार्कों में जाते हैं जहाँ सुविधाएं उच्चतम स्तर की रहती हैं।
प्रदेश के वन पर्यावरण, जन्तु एवं उद्यान मंत्री श्रीमान दारा सिंह चौहान जी अनभिज्ञ हैं, अनजान हैं या उनके मातहत उन्हें इस कमी से अवगत नहीं करा रहे हैं। दारा सिंह जी को स्वयं इस पर ध्यान देना चाहिए, यदि राजधानी में यह स्थिति है तो जनपदो के पार्कों की स्थिति क्या होगी ?
फिलहाल यह ठीक नहीं है, दु:खद है यह, कष्टकारी है यह। तत्काल सही कराए इसे दारा सिंह जी और उनकी सरकार।
-भारत







