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    Shagun News India
    Home»साहित्य

    परत दर परत

    ShagunBy ShagunOctober 29, 2021 साहित्य 1 Comment15 Mins Read
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    आशा शैली

    दो दिन से पानी की मोटर खराब थी। कल प्लम्बर ने बड़ी खुशामद के बाद जब सुबह आने का आश्वासन दिया तब जाकर सुजाता का मन कुछ शान्त हुआ था फिर भी जैसे एक अविश्वास-सा बना हुआ था, इसीलिए आज छः बजे से ही सुजाता घर के पिछले बरामदे में प्लम्बर की राह देखती चक्कर काट रही थी। यहाँ से पूरा नहीं तो आधा शहर तो दिखाई दे ही जाता था।

    प्लम्बर के घर पर फोन भी तो नहीं था कि वह फोन करके पूछ ही लेती या याद दिला देती। अब तो चुपचाप इंतज़ार करना है। राह देखते-देखते जब साढ़े सात बज गए तो वह थककर कुर्सी पर बैठकर नीचे शहर की तलहटी में बहती सतलुज नदी की लहरों से मन बहलाने की कोशिश करने लगी।

    शहर के कदमों में बहती सतलुज नदी कुल्लू और शिमला जिले की विभाजन रेखा का काम करती, शहर को गुंजाती पूरे जोर-शोर से बह रही थी। अचानक ही सुजाता को लगा कि पुल पर कुछ भीड़-सी है। अभी वह बात को समझने की कोशिश करती कि कुछ लोगों को उसने पुल की तरफ दौड़ते देखा। थोड़ी ही देर में पुलिस भी पहुँच गई वहाँ। सुजाता की जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी। सोच रही थी कि बाहर जाकर बात का पता लगाएं, कि तभी पड़ोस की अर्चना भागती हुई आई, ‘‘आंटी……आंटी!’’ अर्चना हाँफ रही थी।

    ‘‘क्या हुआ अर्चना? तुम हाँफ क्यों रही हो?’’ पर अर्चना शायद खुद पर काबू पाने की चेष्टा कर रही थी, उसने पुल की तरफ इशारा किया।

    ‘‘हाँ, मैं भी देख ही रही हूँ, पर हुआ क्या है?’’ अब तक अर्चना अपनी साँसों पर काबू पाकर कुर्सी पर बैठ चुकी थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें फैलकर और भी बड़ी दिखाई दे रही थीं,
    ‘‘आंटी, मधुर……मधुर की बहू ने…. पुल पर से सतलुज में छलांग लगा दी है। उसकी चप्पल और दुपट्टा वहाँ मिला है।’’

    ‘‘क्या कह रही है रे?’’ सुजाता चौंककर खड़ी हो गई।
    ‘‘हाँ आंटी। उनके घर में तो बड़ी भीड़ है, वहाँ तो पुलिस वाले पहले गए थे, अब पुल पर आए हैं। ’’
    ‘‘तुझे किसने बताया?’’

    ‘‘मधुर आंटी के नौकर हरी ने। वह दुकान पर सफाई करने जा ही रहा था कि मधुर आंटी की बेटी गौरी पुल की तरफ से भागती हुई आई और उसने ही कहा कि नयना भाभी ने पुल पर से नदी में छलांग लगा दी है।’’

    सुजाता की साँस अटक गई थी। उसे अपनी समस्या तो भूल ही गई। आँखों के आगे नयना का मासूम-सा चेहरा बार-बार घूमने लगा। अभी एक महीना ही तो हुआ था उस घर में शहनाई बजे।
    नयना बतरा, उसकी बेटी आरती की नई टीचर थी। पिछले अभिभावक दिवस पर जब वह आरती के स्कूल पोर्टमोर में मीटिंग के लिए शिमला गई थी, तभी उसका नयना से परिचय हुआ था। अभी छः महीने पहले की ही तो बात है। मीटिंग से कुछ पहले ही प्रिंसिपल ने अभिभावकों को नए आए शिक्षकों का परिचय दिया जिनमें नयना बतरा भी थी। नयना बहुत हँसमुख और चंचल लग रही थी। बल्कि यूँ कहा जाए कि उसकी तो आँखें ही बोलती थीं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। उस एक मुलाकात में ही वह सुजाता को अच्छी लगने लगी थी परन्तु दूसरे दिन सुजाता घर वापस लौट आई थी।

    आरती पोर्टमोर के हॉस्टल में थी। वह जब भी माँ को फोन करती तो नयना मैडम के बारे में जरूर बात करती। तभी एक दिन आरती ने बताया कि उसकी मैडम अब रामपुर बुशहर ही आ रही है। उनकी शादी मधुर आंटी के बेटे शील से हो रही है,

    ‘‘मम्मी! आप जरूर मेरी मैम को मिलकर आना। ’’

    हालांकि मधुर का घर उनके घर से ज्यादा दूर नहीं था पर सुजाता चाहकर भी नयना से मिलने का समय नहीं निकाल पाई। आज उसी नयना की आत्महत्या का समचार था, जो उसके गले नहीं उतर रहा था। कितनी विचित्र बात थी, सुजाता कैसे विश्वास कर ले इस बात पर? आरती ने बताया था कि नयना मैडम जूडो-कराटे की चैम्पियन भी रही हैं और कॉलेज यूनियन की लीडर भी। ऐसी लड़की विवाह के एक महीने बाद ही आत्महत्या कर ले…..? असम्भव।

    दोपहर को आरती का फोन आया, वह घटना की सत्यता के बारे संदिग्ध थी। सुजाता की पुष्टि पर वह रोने ही लग गई आर रोते-रोते बोली, ‘‘नहीं मम्मी, ऐसा नहीं हो सकता। हमारी मैम तो कहती थी कि आत्महत्या कायर लोग करते हैं। बहादुर तो मुसीबतों को सामना करते हैं। वो कैसे कर सकती हैं आत्महत्या? नहीं सब लोग झूठ बोल रहे हैं। हमारे स्कूल में भी सब ऐसा ही कह रहे हैं।’’ सुजाता ने बड़ी मुश्किल से बेटी को समझाया, पर सच क्या है इसका पता नहीं चल रहा था।

    इस घटना को तीन दिन बीत गए थे। खबरें छन-छन कर आ ही रही थीं। फिर सुना गया कि नयना की माँ रामपुर पुलिस स्टेशन गई थी, अपनी बेटी की गुमशुदगी की रपट लिखाने पर पुलिस वालों ने रपट नहीं लिखी। अब तो हर रोज़ कोई न कोई नई बात सामने आने लगी थी। फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ता गया और लोग भूलने लगे नयना और मधुर को। तभी एक दिन पूरा शहर सन्नाटे में आ गया। मधुर, उसकी बेटी गौरी और बेटा शील दहेज अधिनियम के अन्तर्गत धर लिया गया। मामला क्या है जानने के लिए सुजाता ने शाम को मधुर की अभिन्न मित्र बेला को घेर लिया।

    बेला, सुजाता के बगल वाले मकान में ही रहती थी। उसके पास टीवी नहीं था और वह रोज संध्या के भोजन से निपटकर सुजाता के पास टीवी देखने बैठा करती थी। उस रात भी भोजन से निवृत्त होकर जब बेला और सुजाता टैलीविजन के सामने बैठी सीरियल देख रही थीं तो सुजाता ने अचानक ही बात छेड़ दी,

    ‘‘बहन जी, कैसी है मधुर? आप गए थे उसे दखने?’’

    ‘‘हाँ भाभी! गई तो थी, पर हम लोग कर क्या सकते हैं बेचारी के लिए? ऐसी गन्दी बहू ले आई कम्बख़त कि जेल का मुँह देखने की नौबत आ गई पूरे परिवार को।’’
    ‘‘क्यों क्या हुआ…..?’’ सुजाता ने एकदम अनजान बनते हुए कहा।

    ‘‘तुम्हें नहीं पता क्या…., बहू की माँ ने दहेज का केस कर दिया है। बदमाश राण्ड, अपने यार के साथ खुद भाग गई और बेचारी मधुर के पूरे परिवार को फंसा गई।’’
    ‘‘पर बहन जी, मैंने तो सुना था कि पुलिस ने उसका केस ही दर्ज नहीं किया फिर ये कैसे हो गया?’’

    ‘‘अरे भाभी, तुम ना! बहुत सीधी हो। वो जो पी.डब्लयू.डी. मनिस्टर है न, वह उनके गाँव का है। बस वही आकर बैठ गया पुलिस वालों की छाती पर। अब तो केस सी.बी.आई. के पास चला गया है। पता नहीं क्या होगा।’’ बहन जी का स्वर चिन्ता में डूबा हुआ था।
    ‘‘परेशानी की क्या बात है बहन जी, अब और क्या होना है? सीबीआई तो दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी।’’

    ‘‘यही तो परेशानी की बात है, यहाँ तो कोई सुनने वाला भी नहीं बेचारी का। आदमी पहले ही नहीं, बेटा भी जेल में है खुद तो अस्पताल में पड़ी है।’’

    ‘‘क्यों अस्पताल में क्यों?’’ सुजाता ने अनजान बनते हुए पूछा।

    ‘‘अरे, उसे तो पुलिस को देखते ही हार्ट अटैक पड़ गया था। पुलिस वाले ही उसे अस्पताल ले गए थे।’’ फिर थोड़ा रुक कर कहने लगीं, ‘‘बहू गई तो गई राण्ड, पर जाते-जाते बेचारी मधुर के 50 तोले के सोने के कंगन भी ले गई। इतना खर्चा शादी में किया ऊपर से यह मुसीबत। बेचारी मधुर तो मारी गई बेमौत।’’

    ‘‘हाँ, कह तो आप ठीक ही रहे हैं।’’ सुजाता ने कहा, ‘‘पर मैंने तो सुना है, कि नयना के ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में 15000/- के नए नोट भी निकले हैं। अगर वह अपने पंद्रह हज़ार के नोट वहीं पर छोड़ गई तो मधुर के कंगन क्यों ले गई?’’

    ‘‘पहने हुए थे राण्ड ने। मधुर ने दिए थे उसे शादी में मुँह दिखाई।’’ बेला बहन जी अपना पूरा गुबार उस नयना पर निकाल रही थीं, जिसका अभी तक कोई सुराग भी नहीं मिला था।

    हर दिन एक नई कहानी सुनने को मिल रही थी, कोई कहता, एक महीना हो गया शादी को आज तक किसी ने नयना की शक्ल भी नहीं देखी। कोई कहता, ससुराल वालों ने मार दी लड़की। यानि जितने मुँह उतनी बातें। सीबीआई. ने पूरे जोर-शोर से अपना काम शुरू कर दिया था। शहर के बहुत से बा-रसूख लोग धरे जा रहे थे रोज छान-बीन के चक्कर में।

    ऐसे माहौल में शहर में एक बार फिर से जैसे भूकम्प आ गया हो, शोर मचा, मधुर के छोटे बेटे को खेल आ गई है। उस पर देवी का प्राकट्य हो गया है। कौतुहल वश सुजाता भी भीड़ में शामिल हो गई अन्यथा उसे इन सब बातों में कोई रुचि नहीं थी।

    सुजाता ने देखा, घर में सारा शहर उमड़ा पड़ा था। पैर रखने को जगह नहीं मिल रही थी। बड़ी मुश्किल से कुछ लोगों को धकेलते हुए उसने एक ऐसे कोने में खड़े होने के लिए जगह बना ली जहाँ से मधुर का छोटा बेटा सुमेर बैठा हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था।

    सुजाता ने देखा, सुमेर पूजा करने की मुद्रा में लग रहा था। पालथी मार कर बैठे सुमेर के माथे पर बड़ा-सा रोली का तिलक लगा था, जिस पर चावल चमक रहे थे। हालांकि सुमेर की आयु मुश्किल से पंद्रह साल की थी, परन्तु इस समय उसके चेहरे पर पूर्ण गम्भीरता का साम्राज्य फैला हुआ था। सामने थाली में थोड़ी पूजा की सामग्री भी रखी हुई थी। भीड़ में एक पुलिस इंस्पेक्टर के साथ दो सिपाही भी खड़े थे। सम्भवतया सोच रहे थे कि क्या कर सकते हैं।

    मधुर, गौरी और शील, तीनों ही पुलिस हिरासत में थे, घर में वयस्क के नाम पर केवल एक नौकर हरी था और थी परिवार की एक विवाहित बेटी जो घटना के बाद ही आई थी। वह भी हतप्रभ खड़ी थी। सुमेर थोड़ी-थोड़ी देर बाद सिर को गोल-गोल घुमाता कह रहा था, ‘‘काली! मैं काली हूँ। खुश हूँ। मुझे बलि मिली है, मैं खुश हूँ।…..और बलि चाहिए, और बलि।’’

    अब पुलिस इंस्पेक्टर सुमेर के पास आकर पूछने लगा, ‘‘बेटा…..मुझे बताओ, क्या हुआ है, किसकी बलि हुई है?’’ पर सुमेर जैसे कुछ सुन ही नहीं रहा था। फिर बोलने लगा, ‘‘काली हूँ, काली। आधी बलि मिली है, और लूँगी….और लूँगी…..और बलि…..’’ और सिर को पूरे जोर से गोल-गोल घुमाने लगा।

    अब एक बुजुर्ग महिला धरती पर माथा टेक कर बोली, ‘‘माता। यदि तू काली माँ है तो हमें बता, घर की नई बहू कहाँ चली गई और तुझे किसकी बलि दी गई है? बकरे की या मुर्गे की?’’
    ‘‘नहीं, मुझे नर बलि दी गई है। नई बहू की। नई बहू….हाँ…..हाँ नई बहू।’’ सुमेर का सिर बराबर घूम रहा था, अब उसने सिर को नीचे धरती से लगा दिया था। इंस्पेक्टर ने उसका सिर उठाना चाहा तो वह बिफर गया,

    ‘‘दूर रहो। वहाँ देखो जाकर, घास के नीचे। वहीं रखी थी मेरी बलि।’’ उसने बिना सिर उठाए ही कहा। इंस्पेक्टर ने तुरन्त सिपाहियों को इशारा किया। सिपाही उधर को हो लिए जहाँ घर की गाय के लिए घास रखा जाता था। ऊपर से थोड़ा-सा हरा घास उठाने के बाद नीचे की सूखी घास ऐसे दबी हुई था जैसे कोई वज़नदार चीज़ उस पर रखी गई हो। तभी एक सिपाही चिल्लाया ‘‘साब! साब, पायल।’’ यह पायल उसी घास में उलझी हुई थी। उसने पायल लाकर इंस्पेक्टर को दे दी। बड़े गौर से पायल को देखते हुए इंस्पेक्टर नौकर की तरफ घूमा। तो हरि ने आँखें झुकाकर कहा, ‘‘जी साब, ये बहू जी की ही है। ये उन्हें ढीली थी, कई बार निकल जाती थी। एक बार मुझे भी खोजने को कहा था मैंने तभी देखी थी।’’

    अचानक सब का ध्यान फिर सुमेर की तरफ चला गया जो जोर-जोर से रोने लग गया था और रोते-रोते जमीन पर ही लेट गया। पर अब तक तो मामला पलट चुका था। पुलिस के संदेह की सूई परिवार की ओर घूम चुकी थी। इंस्पेक्टर ने सुमेर को गोद में उठा लिया तो वह कुछ नहीं बोला। उसे मानसिक चिकित्सा हेतु ले जाया गया। पुलिस की जीप निकली तो भीड़ भी छंटने लगी। घर आकर सुजाता और उलझ गई, क्या हुआ होगा? उसे लग रहा था कि सुमेर नाटक कर रहा है। उसे अवश्य ही बहुत कुछ पता है जो वह कह नहीं पा रहा। शायद इंस्पेक्टर को भी वही लगा हो जो उसे लगा है, इसीलिए वह सुमेर को ले गया है।

    उधर हिरासत में गौरी अपने बयान पल-पल बदल रही थी। कभी वह कहती कि वह और नयना दोनों रोज नदी पर घूमने जाती थीं, कभी कहती उसने नयना को उधर जाते देखा तो उसका पीछा किया। शील ने पुलिस को बताया कि दो दिन बाद नयना को बीए के पेपर देने अपने मायके जाना था। अलबत्ता मधुर चुप थी।

    बड़े लोग, बड़ी बातें। पर कुछ दिन बाद सब शान्त हो गया। मधुर का परिवार जमानत पर आ गया और मुकदमा चलता रहा।

    दो साल गुज़र गए। इस बीच सुजाता ने गाड़ी ले ली थी। पड़ोस के गाँव का ही एक लड़का सुजाता ने ड्राइवर रख लिया थी गाड़ी के लिए, उसका नाम सोनू था। जब उसे कहीं जाना होता तो सोनू को बुला लेती।

    एक दिन सोनू ने उसे बताया, ‘‘बीबी जी! मधुर की बेटी गौरी ने फांसी लगा ली है।’’
    ‘‘क्यों…?’’
    ‘‘जैसी करनी, वैसी भरनी। यह तो होना ही था।’’
    ‘‘पर क्यों होना था?’’ सुजाता थोड़ा खीज गई।

    ‘‘बीबी जी! जब बेगानी बेटियों को जहर देकर मारा जाता है तो अपनी बेटियों के बारे में भी सोचना चाहिए कि नहीं? सोनू ने उल्टा सवाल कर दिया।

    ‘‘पर तू कैसे कह रहा है कि बहू इन्होंने मारी है। कुछ निकला तो है ही नहीं।’’

    ‘‘निकलेगा कैसे, बड़े घरों के मामले ऐसे ही दबते हैं।’’ तू तो ऐसे कह रहा है जैसे सब कुछ तेरी आँखों के सामने हुआ हो।’’ सुजाता की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।

    ‘‘और क्या, सब सामने ही तो था। लाश तो मैं ही फेंक कर आया था।’’
    ‘‘क्या कह रहा है रे?’’

    ‘‘हाँ बीबी जी।’’ सोनू रुआंसा हो गया, जब तक मैंने सी.बी.आई वालों को सब कुछ नहीं बता दिया, मेरे मन पर भारी बोझ रहता था, पर अब मैं हल्का महसूस कर रहा हूँ। मुझे हर समय लगता था, कि मैं भी इस हत्या में शामिल हूँ। मैंने तो जो सच था, बता दिया अब उनको सज़ा मिले या न मिले मैं दोषी नहीं हूँ।’’

    ‘‘पर तू इस मामले में कहाँ से कूद गया। तू तो उन दिनों सरकारी गाड़ी चलाता था न?’’
    ‘‘हाँ जी, कच्ची नौकरी थी। जैसे आप बुला लेते हैं, वैसे ही साब भी बुला लेते थे इसीलिए फंस गया। अब मैं आपको ठीक से बता ही देता हूँ सारा मामला, पर चाय भी पियूँगा ।’’ वह पालथी मारकर वहीं जमीन पर बैठ गया। सुजाता को भी चाय की तलब तो लग ही रही थी, वह चाय बना लाई। चाय का कप सोनू को दिया और सामने ही कुर्सी पर बैठ गई। सोनू ने चाय का कप पकड़ा फिर बड़े मनोयोग से सारी कहानी सुनाने लगा,

    ‘‘उस दिन मेरे साहब की मेम साब, अपने सेब के बाग से बहुत देर में वापस आई थी इसलिए मुझे भी घर जाने में देर हो गई। घर जाकर खाना खाया और थका हुआ था तो गहरी नींद आ गई। रात आधी गुज़र गई थी कि दरवाजा भड़भड़ाने लगा। घर वाली मेरे उठने से पहले ही उठकर बाहर गई, लौटकर बोली ‘साब ने बुलाया है। मैं कुढ़ता हुआ कपड़े फंसाता बाहर निकल गया। कोठी पर पहुँचा तो साब ने कहा, ‘इसी समय शिमला जाना है।’ अब साब को जवाब कैसे देता चल पड़ा, पर तभी साब ने जीप बाजार में उतारने को कहा। मधुर बीबी जी के घर के पास पहुँचकर उन्होंने गाड़ी रुकवाई और घर में चले गए। रोज का काम था, हम छोटे लोग क्या कह सकते थे। मैंने सोचा शायद ये भी जाती होंगी, पर थोड़ी ही देर बाद शील बाबू और हमारे साहब, एक भारी-सी बोरी को दोनों तरफ से पकड़े बाहर आए और बोरी को जीप के पिछले हिस्से में पटक दिया और हम शिमला की सड़क पर हो लिए।’’ वह थोड़ा रुका, जैसे बोलते-बोलते थक गया हो।

    ‘‘सैंज से पहले ही साहब ने मुझे गाड़ी लूहरी वाली सड़क पर डालने को कहा तो मैंने गाड़ी नीचे वाली सड़क पर उतार दी। पुल के पास पहुँचकर साब ने गाड़ी रोकने को कहा।

    गाड़ी रुकने पर साहब नीचे उतरे और बोरी को अकेले घसीटने लगे तो मैंने उनकी मदद करने के लिए बोरी को पीछे से पकड़ा, अब मुझे लगा कि बोरी में कुछ नरम-नरम सी चीज़ है। पर जब तक मैं कुछ सोचता-समझता बोरी सतलुज के पानी में थी। इतना ही नहीं जिस जगह बोरी फेंकी गई थी, वहाँ कुछ ही समय पहले एक जोड़ा मगरमच्छ लाकर छोड़े गए थे। फिर साब ने लॉगबुक भरी और स्टेशन शिमला लिख दिया। तीन दिन बाद जब हम वापस आए तब मामला मेरी समझ में आया। कैसे हैं न ये बड़े लोग, बस एक फ्रिज नहीं आया तो लड़की मार दी। वह भी पैसे तो आ ही गए थे, बहू ने उन्हें बताया नहीं था।’’

    सुजाता आँखें फाड़े सोनू को देख रही थी कि तभी सोनू फिर बोल उठा, ‘‘बीबी जी, आपको पता ही नहीं, सुमेर को कोई देवी-वेवी नहीं आई थी। उन लोगों ने सुमेर के सामने ही कोई जहरीली चीज बहू जी को जबरदस्ती पिलाई थी। वह चीखता रहा, ‘मत मारो भाभी को’ पर बड़े भैया ने उन्हें पकड़ा और गौरी ने कटोरी जबरदस्ती उनके मुँह से लगा दी। मधुर बीबी ने उनके बाल खींचे और मुँह खोला। बड़ा तेज जहर था थोड़ी ही देर में मर गई बेचारी। सुमेर ने तो नाटक किया था, ताकि सब पकड़े जाएँ।’’

    ‘‘हूँ…। तो यह सब सुमेर ने बताया होगा पुलिस को।’’ सुजाता ने एक ठंडी साँस भरते हुए कहा, ‘‘फिर भी छूट ही गए सब। हाँ भाई! पैसा है तो हर गुनाह माफ।’’

    ‘‘बीबी जी, इस दुनिया में तो छूट गए, पर भगवान के घर से कैसे छूटेंगे। आँख के सामने है।’’ कहता हुआ वह उठकर खड़ा हो गया।

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    1 Comment

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