चीन से बढ़ता तनाव

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अपनी विस्तारवादी सोंच के कारण न तो चैन से बैठ पा रहा है और न ही किसी को बैठने दे रहा है। दुश्मन बनाना चीन की फितरत है। अब इस बात में कोई शक नहीं कि चीन ने भारत के साथ तनातनी को जहां तक हो सके, लंबा खींचने का मन बना लिया है और इसके लिए वह किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है।

बता दें कि पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर सोमवार शाम उसकी तरफ से की गई गोलाबारी के बाद यह भी साबित हो गया है कि वह भारत के साथ युद्ध के नित नए बहाने खोज रहा है। हैरत की बात यह है कि चीन एक तरफ बातचीत का नाटक भी कर रहा है। और दूसरी ओर उकसाने वाली कार्रवाइयां भी। तनाव घटाने के लिए सैन्य एवं कूटनीतिक स्तर की वार्ताएं चल रही हैं।

मॉस्को में रक्षा मंत्री और उनके चीनी समकक्ष के बीच बातचीत हुई लेकिन दो दिन बाद ही चीन ने अपना रंग दिखाते हुए सात सितंबर को भारत के इलाके में न सिर्फ घुसने की कोशिश की बल्कि गोलियां चलाईं। चीन के इरादों के बारे में इसी तथ्य से अच्छी तरह समझा जा सकता है कि उसने 45 साल में पहली बारे मोर्चे पर गोलियां चलाई हैं। इससे यह बात साबित होती है कि वह भारत की सहनशीलता को परख रहा है। 

बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि चीन झूठा प्रचार भी कर रहा है। जैसा कि भारतीय सेना ने साफ तौर पर कहा कि सोमवार शाम की घटना पर चीन सेना के पश्चिमी थियेटर कमान ने रात में जो बयान जारी किया, वह घरेलू ही नहीं बल्कि अंतर्राष्टीय स्तर पर भी लोगों को गुमराह करने वाला है। भारत की ओर से हवाई फायरिंग नहीं की गई बल्कि इसके उलट सात सितंबर को पैंगोंग झील के दक्षिणी इलाके में चीनी सैनिकों ने हवाई फायरिंग की।

इधर भारत का रुख साफ है कि जबतक सीमा पर पांच मई से पूर्व की स्थिति बहाल नहीं हो जाती तब तक शांति बहाली की दिशा में बढ़ पाना संभव नहीं है। हालांकि चीन का बर्ताव इस आशय के पूरी तरह विपरीत है। जनता के हित के बारे में सोचने की शी जिनपिंग को फुरसत ही नहीं है।फिलहाल युद्ध के अलावा चीन को अपनी जनता के हित के बारे में सोचने की शी जिनपिंग को फुरसत ही नहीं है।

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