व्यंग्य: नीतू सिंह
हमारे समाज में प्यार और शादी का तमाशा कुछ ऐसा है कि ना तो स्क्रिप्ट समझ आती है, ना ही किरदारों का रोल। गोंडा की एक महिला, दो बच्चों की मां, को शिवराज चौहान से प्यार हो गया। पति हरिश्चंद्र ने समझाने की कोशिश की, थाने तक बात पहुंची, लेकिन प्यार का भूत ऐसा सवार हुआ कि आखिरकार गांव के मंदिर में प्रेमी के साथ सात फेरे ले लिए। वीडियो बनाने वाले ने पूछा, “खुश हो?” जवाब आया, “जबरन शादी कराई जा रही है!” अरे भाई, ये प्यार है या पंचायत का फैसला? शादी के मंडप में भी जबरदस्ती का ड्रामा! लगता है, प्यार का GPS गोंडा में रास्ता भटक गया।
इधर दूसरी कहानी में एक पंखा बनाते-बनाते दिल की सेटिंग हो गई। पंखा खराब हुआ, मिस्त्री आया, नंबर दिया, और बोला, “पंखा खराब हो तो फोन करना।” तीन-चार बार पंखा खराब क्या हुआ, दिल भी खराब हो गया। नतीजा? मिस्त्री और मैडम ने शादी कर ली। अब ये तो समझ नहीं आया कि पंखा ठीक हुआ या प्यार की हवा चल पड़ी। लेकिन इतना तय है, पंखे की गारंटी से ज्यादा इनके प्यार की वारंटी लंबी निकली।
और फिर तीसरा किस्सा, जहां भतीजे ने चाची से आंख लड़ा ली और शादी का ढोल बजा दिया। अब ये तो समझ नहीं आता कि ये परिवार का रियलिटी शो है या लव स्टोरी का नया सीजन। रिश्तों का ये कॉकटेल ऐसा है कि सास-बहू सीरियल भी फेल हो जाए।
ये सारे किस्से बताते हैं कि हमारे समाज में प्यार और शादी का खेल कुछ ज्यादा ही रंगीन हो चला है। कोई मंदिर में जबरन फेरे ले रहा है, कोई पंखे की हवा में रोमांस ढूंढ रहा है, तो कोई रिश्तों की गणितगणना में उलझकर शादी के मजे ले रहा है। लगता है, प्यार अब दिल से दिल तक नहीं, बल्कि पंचायत, मिस्त्री और मोबाइल नंबर तक पहुंच गया है।
तो भाई, अगली बार अगर पंखा खराब हो, तो मिस्त्री को फोन करने से पहले दो बार सोच लीजिए। कहीं पंखे की हवा में शादी का बवंडर न आ जाए। और हां, अगर प्यार में पड़ें, तो गोंडा के मंदिर से थोड़ा बचके, क्योंकि वहां पंचायत का फैसला आपका इंतजार कर रहा हो सकता है!







