लखनऊ मेट्रो एक प्रेरणा स्रोत बनाम पूर्वांचल मस्तिष्क ज्वर महामारी एक अभिशाप

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आज 6 सितम्बर से मेट्रो रेल सुविधा जन सामान्य के लिए उपलब्ध हो गई है। इस बड़ी उपलब्धि पर लखनऊ वासिओं को कोटिशः बधाईयॉ। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने में ठीक तीन वर्ष का समय लगा। इसे पूरा करने के लिए मेट्रो मैन के नाम से प्रसिद्ध वरिष्ठ इंजीनियर व लौह पुरूष श्री ई. श्रीधरन सहित उनकी समस्त टीम को नमन एवं कोटिशः बधाई। जिस लगन व निष्ठा के साथ श्री श्रीधरन व उनकी टीम के प्रत्येक सदस्य ने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए दिन रात एक करके सरकारी खजाने की एक-एक आना- पाई का सही उपयोग किया है वह अत्यंत प्रशंसनीय है। लखनऊ नगर के सभी समाचार पत्रों के कई-कई पृष्ठों में लखनऊ मेट्रों के आगमन व इस प्रोजेक्ट को रिकार्ड समय में पूरा करने में जुटे सभी श्रमवीरों की प्रशंसा के गुणगान छपे हैं और छपना भी चाहिये क्योंकि उत्तर प्रदेश में यह वास्तव में एक अत्यन्त प्रशंसनीय कार्य हुआ है।

इस प्रोजेक्ट को पूरा होने पर एक ओर जहॉ हर्ष की लहर मन मस्तिष्क को परम आनन्द देती है, वही गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई दर्जनों मासूम नौनिहालो की मृत्यु से विषाद की एक गहरी रेखा मन मस्तिष्क को चीरती हुई हृदय में छेद कर देती है। हम भारत के लोग किसी कार्य को करने के लिए जब भी कटिबद्ध हो जाते हैं तो उस कार्य को समय से पूरा कर ही देते हैं और धन का अपव्यय होने से भी बचा लेते हैं। लखनऊ मेट्रो से कई गुना महत्वपूर्ण पूर्वांचल की मस्तिष्क ज्वर उन्मूलन सहित जीवन रक्षा की अनेकों प्रोजेक्टस को हम न केवल प्रारम्भ ही नहीं करते हैंं बल्कि ऐसी प्रोजेक्टस को पूरा करने के लिये साल- दर साल आविंंटत किए गये बजट को ही हम खा जाते हैं। वैसे तो प्रदेश के प्रत्येक क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सेवाये बदहाल हैं किन्तु प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित लगभग सभी जनपदों में मस्तिष्क ज्वर सहित पानी से उत्पन्न होने वाली बीमारियों के कारण वहां की जनता की सालों- साल से जो दुर्दशा हो रही है वह सभ्य समाज क्या मानव मात्र के लिये ही एक कलंक है।

एक ओर लखनऊ मेट्रों में यात्रा करने के लिये तीन फुट तक की लम्बाई के बच्चों का टिकट माफ है वही दूसरी और पूर्वांचल के बच्चों को या तो मॉ के गर्भ से ही पृथ्वी पर आने से मना कर दिया जाता है या जन्म हो भी गया हो तो उसी भारत के हम लोग उन शिशुओं को चन्द दिन के भीतर ही कभी ऑक्सीजन की सप्लाई रोक कर, कभी दवाईयों की कमी दिखा कर, कभी डाक्टरों की अनुपलब्धता दर्शाकर अथवा परीक्षण करने वाले उपकरणों की खराबी दिखाकर उन्हे काल के कराल गाल में समाहित होने को मजबूर कर देते हैं। यह क्या हमारी नीति और नीयत में दोगला पन नहीं दर्शाता है।

गोरखपुर के बीआरडीमेडिकल कॉलेज व र्फरूखाबाद के जिला चिकित्सालय में हुई शिशुओं की दर्दनाक मृत्यु क्या हमारे जमीर को झकझोरने के लिये पर्याप्त नहीं है। पूर्वांचल के जनपदों को उपरोक्त बीमारियों से मुक्त कराने का अभियान पिछले सात दशक से चलता हुआ सुना जा रहा है, क्या इस अभियान के समाप्त होने की तिथि भी लखनऊ मेट्रो के उद्दघाटन की तिथि की भॉति हम भारत के लोग निर्धारित कर सकते हैं या नहीं। क्या लखनऊ मेट्रो की उपलब्धि का श्रेय लेने के लिये पूर्व व वर्तमान सरकारों के बीच मची होड़ की भॅाति जनता की यह सभी सरकारें उसी समाज के गरीब मासूम शिशुओं को जीने का एक अवसर प्रदान करने के लिये भी आपस में होड़ मचा सकती हैं या नहीं। उत्तर है हॉ किन्तु नीयत साफ नही नजर आती है मात्र इसी लिए ऐसा नहीं हो पा रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज के यही लोग जो लखनऊ मेट्रों जैसी प्रोजेक्ट को एक समय सीमा के भीतर पूरा कर सकते हैं वही लोग उसी प्रकार पूर्वांचल की जनता को भी जीने का एक अवसर प्रदान करने के लिये बिमारी उन्मूलन की प्रोजेक्ट को भी समयबद्ध सीमा के भीतर पूरा कर सकते हैं। केवल नीति और नीयत दोनों को खुले मन से सेवाभाव से प्रेरित होकर मानवीय पीड़ा का आभास करते हुए एक साथ बैठना होगा। यदि हम विश्वगुरू बनने की मंशा रखते है तो हमें अपने दोहरे अर्थो वाले व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा। हम मष्तिष्क ज्वर सहित पूर्वांचल की सभी महामारियों को समूल नष्ट करने में सक्षम है केवल छोटे-छोटे स्वार्थो से उपर उठकर काम करने की आवश्यकता है। इस धर्म निर्वहन के लिए सरकार को जनता का आहृवान करते हुए जुट जाना चाहिए और अगले तीन वर्ष की अवधि में लखनऊ मेट्रो रेल प्रोजेक्ट की भॉति पूरा कर देना चाहिए तभी हम सब लोग वास्तविक प्रसंशा के हकदार बनेगें अन्यथा नहीं। मात्र समाचार पत्रों व टीवी चैनलों पर छप जाने से प्रसंशा के पात्र होना अपने आप से छल करने के बराबर होता है।

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