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    Home»धर्म»धर्म-कर्म

    ‘मणिकर्णिका घाट’ जहां चिता की अग्नि कभी ठंडी नहीं पड़ी

    By November 27, 2017 धर्म-कर्म No Comments3 Mins Read
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    गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट भारत का एक मात्र ऐसा घाट है जहाँ दिन रात यानि 24 घंटे शवों का दाह संस्कार किया जाता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक भारत में सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार निषेध है मगर देश में एक ऐसा श्मशान भी है जहां चौबीस घंटे चिताएं जलती है। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में गंगा तट पर मणिकर्णिका घाट भारत का एक मात्र ऐसा घाट है जहां चिता की अग्नि कभी ठंडी नहीं पड़ी।
    यहां सैकड़ों सालों से चिताएं जलती आ रही हैं। माना जाता है कि यहां मोक्ष प्राप्त करने वाला कभी दोबारा गर्भ में नहीं पहुंचता है। सिर्फ बनारस और आसपास से ही नहीं बल्कि देश के दूरदराज से भी लोग इसी घाट से अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देते हैं।
    शवों को भी अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है
    यहाँ शवों को भी अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है। दिन में करीब ढाई-तीन सौ शव आते हैं और जितने शव जल रहे होते हैं, उससे ज्यादा शव दाह संस्कार की कतार में रहते है।

    भगवान विष्णु ने किया सृजन

    पांच तीर्थों के बीच में पड़ने वाला मणिकर्णिका घाट सृजन और विध्वंस का प्रतीक है। यहां एक तरफ है पवित्र मणिकर्णिका कुंड। कहते हैं भगवान विष्णु ने सृष्टि का सृजन करते समय इसे खोदा था। साथ ही मिलती है श्मशान की राख मिश्रित बलुई मिट्टी यानी जहां जीवन ठहर जाता है। हिंदुओं की मान्यता के अनुसार मणिकर्णिका कुंड धरती पर गंगा के उद्धभव काल से हैै, यही नहीं, इसका छोर हिमालय में निकलता है।

    कई कथाएं हैं प्रचलित

    इस घाट से जुड़ी दो कथाएं हैं। एक के अनुसार भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या करते हुए अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुण्ड खोदा था। उसमें तपस्या के समय आया हुआ उनका स्वेद भर गया। जब शिव वहां प्रसन्न हो कर आये तब विष्णु के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी।

    खो गयी थी पार्वती की कर्णिका

    दूसरी कथा के अनुसार भगवाण शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नही मिल पाती थी। देवी पार्वती इससे परेशान हुईं और शिवजी को रोके रखने हेतु अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा।

    क्या उसने देखी है?

    शिवजी उसे ढूंढ नहींं पाये और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, वे उससे पूछते हैं कि क्या उसने देखी है? प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चाण्डाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बना कर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था।

    शक्ति पीठ भी है यह स्थान

    एक कथा के अनुसार जब शिव जी सती के पार्थिव शरीर को ले जा रहे थे तो जहाँ जहाँ उनके शरीर के अंग गिरे वहां वहां शक्तिपीठ बन गयी। किवंदती के अनुसार सती के कान की कुंडल का मणि इस घाट पर गिरा जिससे की यह भी एक शक्ति पीठ के रूप में स्थापित हो गया और इसका नाम मणिकर्णिका पड़ गया।
    यह एक ऐसा स्थल है जहां मृत्यु भी पर्यटन है।

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