नवरात्रि का पांचवा दिन विशुद्धि चक्र को करता है जागृत, वाणी को मिल जाती है सिद्धी
अलका शुक्ला
चैत्र नवरात्रि का पांचवा दिन ममता, शक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम ‘माँ स्कंदमाता’ को समर्पित है। भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। इनका स्वरूप एक आदर्श मातृत्व का प्रतीक है, जहाँ देवी अपनी गोद में बाल रूप स्कंद को धारण किए हुए हैं। चार भुजाओं वाली माँ के दो हाथों में कमल का पुष्प है, एक हाथ वरमुद्रा में है और एक हाथ से उन्होंने अपने पुत्र को थामा हुआ है। सिंह पर सवार माँ का यह रूप यह संदेश देता है कि ममता का अर्थ केवल कोमलता नहीं, बल्कि अपने सृजन की रक्षा के लिए सिंह जैसी निर्भीकता और शक्ति भी है। वे कमल के आसन पर भी विराजमान होती हैं, इसीलिए इन्हें ‘पद्मासना’ देवी भी कहा जाता है।

आध्यात्मिक धरातल पर माँ स्कंदमाता का संबंध हमारे शरीर के पांचवें चक्र विशुद्धि चक्र से है, जो कंठ में स्थित है। योग विज्ञान के अनुसार, यह चक्र अभिव्यक्ति, संचार और शुद्धिकरण का केंद्र है। जब साधक की ऊर्जा अनाहत (हृदय) से ऊपर उठकर विशुद्धि तक पहुँचती है, तो उसकी वाणी में माधुर्य, सत्य और प्रभाव पैदा होता है। स्कंदमाता की उपासना इस चक्र को सक्रिय कर साधक को वाक-सिद्धि प्रदान करती है। चूँकि स्कंद देवताओं के सेनापति हैं और बुद्धिमत्ता के प्रतीक हैं, इसलिए माँ की यह पूजा साधक की बौद्धिक क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति को असाधारण रूप से बढ़ा देती है।
इस स्वरूप के पीछे छिपा वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष कम्युनिकेशन और इमोशनल इंटेलिजेंस से जुड़ा है। विज्ञान के अनुसार, विशुद्धि चक्र का संबंध हमारी थायराइड ग्रंथि से है, जो शरीर के मेटाबॉलिज्म और विकास को नियंत्रित करती है। माँ स्कंदमाता के मंत्रों का उच्चारण गले की मांसपेशियों और ग्रंथियों में एक विशेष कंपन पैदा करता है, जिससे हार्मोनल संतुलन बना रहता है। मनोविज्ञान के स्तर पर, स्कंदमाता का स्वरूप मल्टी-टास्किंग और बैलेंस का पाठ पढ़ाता है। कैसे एक हाथ में सृजन (पुत्र) को संभालना है और दूसरे में शक्ति (अस्त्र) को। यह आधुनिक जीवन में कार्य और परिवार के बीच संतुलन बनाने की मनोवैज्ञानिक प्रेरणा देता है।
पांचवें दिन के लिए सफेद या रॉयल ब्लू रंग का महत्व है, जो विशालता और स्पष्टता का प्रतीक है। नीला रंग आकाश की तरह असीमित ज्ञान और गहराई को दर्शाता है, जो विशुद्धि चक्र की प्रकृति है। इस दिन की उपासना से साधक के भीतर का द्वंद्व समाप्त होता है और वह अपने विचारों को स्पष्टता के साथ दुनिया के सामने रखने में सक्षम होता है। माँ स्कंदमाता का संदेश अत्यंत सरल और प्रभावी है। शक्ति और ज्ञान वही सार्थक है जो समाज के कल्याण के लिए उपयोग किया जाए। यह साधना का वह पड़ाव है जहाँ भक्त अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से संसार के हित में रूपांतरित करना सीखता है।






