नवेद शिकोह: अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू
मेरा आधा सवाल सुनकर ही नसीर साहब ने खुद की मालूमात के लिए मुझसे कुछ पूछा। उनके सवाल की गहराई समझ कर लगा कि अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के अभिनय से भी गहरी है उनकी समझ और सूझबूझ।मेरा उनसे पहला और आखिरी सवाल यही था कि आपने ऐसा क्या कह दिया कि विरोध….
साॅरी ! तुम्हारी बात काट रहा हूं। मैं काफी कंफ्यूज हूं। बुलंदशहर में शहीद हुए दरोगा का नाम जो मैं जानता हूं वो गलत तो नहीं, शहीद दरोगा का जरा नाम याद दिलाइये!
मैंने कहा- सुबोध कुमार सिंह।
नसीर : यस! मैं गलत नहीं था !
यूपी के बुलंदशहर की ये घटना वाकई दिल दहलाने वाली थी। इससे कौन नही फिक्रमंद होगा। हमें ऐसी स्क्रिप्ट भी कम ही मिलती है। दरोगा सुबोध कुमार सिंह की घटना बेहद अफनोसनाक और चिंताजनक है। अतीत.. भविष्य और वर्तमान में इस तरह की किसी भी अमानवीय घटना का जब भी जिक्र छिड़ेगा हर इंसान फिक्र जाहिर करेगा। ऐसे किस्से हर किसी के फिक्र के दायरे बढ़ा देंगे। हिंसक भीड़ का कोई मजहब नहीं होता वो हर धर्म जाति और समाज के लिए खतरनाक है।
भीड़ के हाथों मारे गये दरोगा की दर्दनाक मौत पर अफसोस या चिंता करने वाले का विरोध !!! ये गुंजाइश कहां से पैदा हो गई !
नसीरुद्दीन शाह मेरे आधे अधूरे सवाल पर ही सवाल की गहराई को समझकर वही बताने लगे जो मैं जानना चाहता था। नसीर की बात को सुनकर लगा कि उनकी सूझबूझ और दूरदर्शिता तो उनकी अदाकारी से भी गहरी है।
दरअसल मैंने खुद के तारूफ के साथ अपने पहले और आखिरी सवाल के कुछ शब्द ही जाहिर किये थे कि नसीर साहब ने मेरी बात काट दी थी। मेरा सवाल था कि आपने कौन सी ऐसी बात कह दी थी कि आप का विरोध हो रहा है।
नसीर आगे कहते है-
यार हम थेटरिस्ट है। असली थेटरिस्ट धर्म-जाति और सियासत में कहां पड़ता है।
थियेटर (रंगमंच) की पहली कक्षा मे ही दिमाग की ग़लाज़त (संकीर्णता) बाहर निकाल दी जाती है। हमारा धर्म हमारी कला होती है और हमारी जाति हमारा पेशा होता है। हम अपनी अदाकारी की संतुष्टि में खुदा और भगवान को महसूस करते हैं।
आतंकवाद की मुखालफत में जिन किरदारों को मैंने जिया उससे मुझे बहुत मकबूलियत मिली है। इन किरदारों में आपने मेरी अदाकारी पसंद की है। मेरी फिल्में आतंक के खिलाफ मुहिम में कामयाब होती रहीं हैं।
आज से नहीं बरसों से मैं कभी किरदारों के जरिये तो कभी असखुद मीडिया में यही कहता रहा हूं कि समाज में बढ़ता जहर आलम-ए-इंसानियत के लिए खतरनाक है।
नफरत भीड़ बन कर किसी को भी.. किसी भी सूरत में कभी भी मार सकती है..
ऐसी घटनायें हुई हैं ना, या नहीं !
मैंने जवाब दिया : हां सर हुई हैं।
तो फिर मैंने क्या गलत बोल दिया!
अरे भाई इसमे हिन्दू-मुस्लिम कहां से आ गया! ~~~ क़हक़का लगाते हैं ~~~
(बात खत्म)






