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    अंधविश्वास या भविष्य की परतों का दर्पण! तय करेगा वक्त-part-2

    By April 25, 2020 Current Issues No Comments9 Mins Read
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    Post Views: 829
    • राहुल कुमार

    ….अगर मानव पहले से ही सब जान ले तो आम मानव के लिये जीवन नीरस हो जायेगा। ज्योतिषि विज्ञान में आज कल जो विद्वजन हैं वो कुछ तो जानकारी दे पाते हैं सब नहीं। धार्मिक ग्रंथों में भी कुछ गूढ़ बातें हैं जो समझने वाले के विवेक पर निर्भर है। यह जो कुछ बातें कोविड19 को लेकर विश्व व भारत के भविष्य से संबंधित हैं उसे पुनः क्रम से आगे की ओर बढ़ा रहे हैं। शीर्षक ‘अंधविश्वास या भविष्य की परतों का दर्पण! तय करेगा वक्त’ पर पहले ही कुछ चर्चा की जा चुकी है। हो सकता है मैं विश्लेषण करने में खरा न उतरूं और हो सकता है उतर भी जाऊँ। लेकिन जो बातें अफवाह बनकर पूरे देश में फैल जायें, मैंने उन्हें कुछ क्षण के लिये सच मान लिया। अपने यहाँ पूजा के लिये रखी तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस का अवलोकन किया। और उड़ती अफवाहों पर आश्चर्य के साथ यहीं विराम भी लगा दिया। जिन-जिन चौपाई व दोहों में वो सुनहरे लाल-भूरे लाल मिले, उन्हें एक रफ में लिखकर उनका विश्लेषण शुरू किया। इस विश्लेषण में हो सकता है, भविष्य में सच्चाई नज़र आये या हो सकता है पूरी सच्चाई नज़र न भी आये। तो यह मेरे विश्लेषण की ही कमी होगी। श्रीरामचरित मानस जैसा पावन ग्रंथ सदा से पावन ही है और सदा पावन ही रहेगा।

    …गतांक से आगे…

    अयोध्या काण्ड के विभिन्न चार पेजों से चार सुनहरे भूरे-लाल बाल जिन चौपाईयों व दोहों से निकले वो निम्नवत हैं-

    305 पेज की तीसरी चौपाई से  –

    * जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।

    सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।-3

    भावार्थ—भगवान हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनि में जन्में, वहाँ-वहाँ हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्र जी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्त तक निभ जाये।।

    इस भावार्थ का सम्बंध आज की आँखों से ये है कि- संसार पुनः ईश्वर के प्रति आस्थावान होगा, जनसमुदाय का एक बड़ा सा हिस्सा अपने पूर्व कार्यों व नवीन कार्य को लेकर भी अब भ्रम में रहेगा। कार्यों के प्रति भ्रम में रहते हुए भी वो अपने परिवार का निबाह जरूर कर लेंगे। (305+3=308=11) अर्थात यह स्थिति 11 माह तक रह सकती है। जिसमें सरकार व दयालु लोग मदद के रूप में सक्षम व समक्ष होंगे।

     

    322 पेज की दूसरी चौपाई-

    *निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।

    कुटिल कठोर कुबुद्धि आभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।-2*

    भावार्थ: यह अपने हाथ से अपनी आँखों को निकालकर देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी, रघुवंशरूपी बाँस के वन के लिये अग्नि हो गयी।-2*

     

    इस भावार्थ का सम्बंध इस महामारी काल में यह है कि- लोग पुनः प्रकृति विनाशक कार्यों में व पाप कार्यों में संलग्न हो जायेंगे, जिससे दुःखों के अथाह सागर का भी सामना कर पड़ सकता है। सत्ता दल के समर्थक प्रचंड रूप से सत्ता के गलत का साथ देते नज़र आयेंगे। देशों में उन देशों के अंदर व वैश्विक देशों में परस्पर विवाद बढ़ने के बहुत आसार बन सकते हैं। यह आसार, सितम्बर-दिसम्बर के बीच में देखने को मिल सकते हैं। ( 322 पेज की दूसरी चौपाई- 3+2+2+2=9, विश्व में कोविड का पहला मामला चीन में दिसम्बर माह के अंत में दिखा तो इस हिसाब से यहाँ आठवें महीने के अंत या नौवें महीने की शुरूआत में यह दिख सकता है। चुंकि भारत में इसकी जानकारी या इसका प्रभाव आमजन को मार्च से समझ में आया तो हो सकता है यहाँ सितम्बर से दिसम्बर के मध्य कोई ऐसी स्थिति पैदा हो।

     

    एक और सुनहरा भूरा-लाल बाल श्रीरामचरित मानस के 349 पेज के 83वें दोहे व पहली चौपाई के बीच मिला—

    *हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।

    पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।-83*दोहा

    *राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।

    नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।-1*चौपाई

    भावार्थ: करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलने के लिये पाले हुए हिरन, नगर के गाय, बैल, बकरी आदि पशु, पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर… श्री राम जी के वियोग में सभी व्याकुल हुए जहाँ-तहाँ स्थिर खड़े हैं, मानो तस्वीरों में लिखकर बनाये हुए हैं। नगर मानो फलों से परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था। नगरवासी सब स्त्री-पुरुष बहुत से पशु-पक्षी थे।

     

    आज के संदर्भ में इन दोहे व चौपाई का भावार्थ- पशु-पक्षियों की स्थिति भी दयनीय हो सकती है। या इनकी संख्या में कमी देखी जा सकती है। (349+83=432=4+3+2=9) अर्थात सितम्बर से दिसम्बर माह इन निरीह पशु-पक्षियों के लिये भी समस्या ला सकता है। इन्हें व्याकुल कर सकता है।

     

    382 पेज के 127 वें दोहे के पास से मिले सुनहरे बाल का आशय—

    *पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

    जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127 दो.*

    भावार्थ—आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परंतु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहने कि लिये स्थान दिखाऊँ।।

    आज के संदर्भ में इस दोहे के आशय का विश्लेषण कुछ इस तरह से हो सका- अब जनसामान्य जो अपने रोजगार के लिये परदेशी भी हो गये थे वो रहने के लिये सोचेंगे कि कहाँ रहें कहाँ न रहें। कई लोग अपने मन को समझाने में कामयाब भी हो जायेंगे। रोजी-रोटी तो हर जगह मिल जायेगी और कुछ समय बाद सभी स्थान सुरक्षित भी हो जायेंगे। इनमें से कई सामान्य जन तो शुरुआती दौर पर कोशिश करेंगे कि अपने गाँव-घर के नजदीक ही रहें और कुछ अपने विवेक से खुद को इस दृष्टिकोण से भी समझा लेंगे कि समस्या तो हर जगह है। तो वो परदेश के लिये पुनः पलायन करेंगे। (382+127=509=14=5) ऐसी स्थितियाँ अक्टूबर 2020 से फरवरी 2021 के बीच बन सकती हैं। ऐसे में संसार में काफी बदलाव देखने को मिलेंगे। कई छोटे स्थानों में खुशहाली तो कई बड़े स्थानों में कुछ कमी नज़र आ सकती है।

     

    अरण्यकांड में 561 पेज की तीसरी चौपाई के पास

    *उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।

    उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरों रघुपति सर लागें।।-3 चौपाई*

    भावार्थ: जब मारीचि ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथ जी की शरण तकी। सोचा उत्तर देते ही यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्री रघुनाथ जी के बाण लगने से ही क्यों न मरूं।।

     

    इस महामारी के संदर्भ में इस दोहे का विश्लेषण कुछ इस तरह से निकाल पाये हैं- मारीच रूपी बहुरूपियों की संख्या ईजाद होगी, ठगों का मायाजाल बढ़ेगा, आमजनों में दुःखों का प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है।(561+3=15=6) अर्थात 6 माह से 15 माह के बीच में स्थितियों के ऐसे होने की संभावना अधिक है। बहुत कुछ खो सकता है। फिर सरकार की दृढ़ नीतियों से ही ऐसे मारीचों व ठगों की संख्या में कमी की जा सकती है।

     

    किष्किंधाकाण्ड में 586 पेज की चौथी चौपाई

    *को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।

     कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।-4*

    भावार्थ: हे वीर! साँवरे और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं। कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने को आप किस कारण वन में बिचर रहे हैं।।

    आज के संदर्भ में इस चौपाई के अर्थ का विश्लेषण कुछ इस तरह से निकला है- कुछ सहयोगियों के चलते भारत पुनः कर्ममार्ग पर चलते हुए, कुछ आश्वस्त होते हुए दुःख को झेलते हुए आगे बढ़ेगा। (586+4=590=14=5) ऐसी स्थितियाँ संभव हैं कि 14 माह से 5 साल के बीच में बन सकती हैं।

     

    सुंदरकाण्ड के 643 पेज की तीसरे नंबर की दूसरी चौपाई—यह 642 पेज की पहले नंबर की दूसरी चौपाई पर भी था।

    *जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।

    प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।-3*

    भावार्थ- जिनकी कीर्ति सब मंगलों से पूर्ण है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना, यह नीति है। प्रभु का प्रस्थान जानकी जी ने भी जान लिया। उनके बायें अँग फड़क कर मानो कह देते थे कि श्री राम आ रहे हैं।

    आज के संदर्भ में इस चौपाई का आशय कुछ इस तरह से निकला- अब स्थितियों में सुधार व लोगों में, सरकार में संतुष्टि का भाव उत्पन्न होगा। कोविड-19 के खत्म होने का समय नजदीक आ जायेगा। (643+2=15 या 6, 642+1=13 या 4) भारत के दृष्टिकोण से देखें तो मार्च में आमजनमानस को यह कोविड-19 के बारे में सही से जानकारी हुई तो मार्च से 6 माह बाद इस वायरस की दवा बन सकती है लेकिन पूर्णतः नहीं। पूर्ण दवा तो एक माह बाद पूर्ण रूप से बन सकती है यानि अक्टूबर में।

     

    उत्तरकाण्ड में 839 पेज के 63 क तथा 63 ख दोहा के पास—

    नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।

    आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु काज।। 63क*

    *सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।

    जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्ह महेस।।63ख*

    सुनहु तात चेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।

    देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।। चौपाई-1*

    भावार्थ: हे नाथ! हे पक्षीराज, आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। आप जो आज्ञा दें मैं अब वही करूँ। हे प्रभो, आप किस कार्य के लिये आये हैं? पक्षीराज गरुड़ जी ने कोमल वचन कहे- आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवजी ने आदरपूर्वक अपने श्रीमुख से की है।।

    हे तात! सुनिये, मैं जिस कारण से आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया फिर आपके दर्शन भी हो गये, आपका पवित्र आश्रम देखकर मेरा मोह, भ्रम आदि सब जाते रहे।

    आज के संदर्भ में इन दोहों का आशय कुछ इस तरह से भी निकाला जा रहा – जब विश्व में कोविड-19 का ईलाज तैयार हो चुका होगा तो उसके कुछ महीने बाद भारत के चिकित्सक व जीव वैज्ञानिक भी इसका बेहतर ईलाज खोज लेंगे। (839+63=902=11) अर्थात कोविड-19 की दवा विश्व में आने के बाद भारत के जीव वैज्ञानिक इसकी बेहतर दवा बना सकते हैं। या दो माह बाद या 11 माह बाद।

     

    वैज्ञानिक मन व चिंतन होने के बावजूद भी मेरे मन में ईश्वर के प्रति अटूट आस्था भी है। 24-25 मार्च 2020 को देशव्यापी एक अफवाह पर पहली बार कुछ क्षण के लिये सत्य का अनुभव भी किया। अचरज भी और विश्वास के साथ संदेह भी। इन विरोधाभासों के बीच कई दिनों तक मन विचलित सा रहा। लेकिन ये लिखने के बाद लगता है मुझे जो अनुभूति हुई वो आप सबके समक्ष रख दिये हैं। अगर ये अनुभूति मेरी व्यक्तिगत मामलों से संबंधित होती तो जरूर इसे मैं किसी से न कहता, पर यह विश्व से संबंधित है, देश से संबंधित है। इसीलिये इस विषय पर चर्चा करना भी जरूरी सा हो गया था। ईश्वर जल्द ही मेरे देश में व इस विश्व में शांति स्थापित करें।

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