- ज्योतिषि के अलावा भी हो सकती है कुछ ज्योतिषि, धर्मग्रंथ भी बताते हैं बहुत सी गूढ़ बातें
- कोविड-19 का उचित ईलाज, विश्व के समक्ष हो सकता है सितंबर से अक्टूबर माह में!
- राहुल कुमार
जैसे ही कोरोना महामारी की रोकथाम के लिये मोदी सरकार ने जनता कर्फ्यू व लॉकडाउन प्रथम की घोषणा की देश के कई प्रदेशों में तरह-तरह के उपाय करने के लिये लोगों के मैसेज व फोन आने लगे। वो कुछ माईथोलॉजी से संबंधित रहे तो कुछ ऐसे ही, पता नहीं बातें कहाँ से उठती हैं और व्यापकता से साथ दूर-दराज तक फैल जाती हैं। ऐसे ही एक बात सामने यह आयी कि रामचरित मानस के बालकाण्ड में भूरे-लाल रंग के बाल निकल रहे हैं, उन्हें गंगाजल में धोकर वो गंगाजल पूरे घर में छिड़कना है व बालों को तुलसी जी में अर्पित करना है। सूचना यह भी मिली कि यह बाल हनुमान जी की कृपा से संबंधित हैं। अलग-अलग प्रदेशों के कुछ बुजुर्गों ने फेसबुक में सत्तर के दशक की भी ऐसी एक घटना का जिक्र किया कि बालकांड से भूरे-लाल रंग के बाल निकले थे। कभी-कभी इनको मानने का, तो अक्सर इनको न मानने का अवसर भी हमारे समक्ष रहता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो हर एक बिंदु पर है बस हमें विज्ञान के परे का भी विज्ञान मालुम हो, क्योंकि मौजूदा विज्ञान भी पूर्ण नहीं है। ऐसी कई चमत्कारिक घटनाएं भी घटती नज़र आती हैं जो ईश्वर की सत्ता को मानने के लिये भी विश्वास पैदा कर देती हैं।
रामचरित मानस से बाल निकलने वाली घटना के लिये कई लोगों के फोन व मैसेज आये। दो दिन तो हमें भी अफवाह लगी..लेकिन जैसे ही कई खास लोगों का फोन आने लगा कि देखने में क्या है, आप भी देख लीजिये तो अनमन-अनमन ही रामचरित मानस खोली गयीं। फिर आश्चर्य की कोई सीमा न रही, बालकांड में लाल-भूरे रंग के बाल जिन-जिन दोहों व चौपाई के पास से निकले उनको पहले एक रफ में कापी में लिखे। विश्वास इसलिये भी बढ़ा कि यह बाल हमारे परिवार के किसी भी सदस्यों से मेल नहीं खाते थे। फिर यह भी कि बालकांड तो जल्दी कोई पढ़ता भी नहीं कि यहाँ बाल टूटकर गिरे होंगे, अक्सर सुंदर कांड ही पढ़ने का रिवाज है। थोड़ा सा विश्वास बढ़ा और उस रहस्य को समझने का पूरा जतन किया गया। जिन-जिन दोहों व चौपाईयों के पास से लाल-भूरे बाल निकल कर सामने आयें उनका पूरा विश्लेषण करने व अंकज्योतिषि का उपयोग करके कुछ बातें सामने निकल कर आयीं। जो चौंकाने वाली थीं। लेकिन जब यह कई बातें मैंने अपने कई जानने वालों को बताया तो हँसी का पात्र भी बना, फिर आगे लिखने की हिम्मत नहीं हुई कि लोग अंधविश्वासी समझेंगे।
यह सब अंधविश्वास है इसलिये इस विषय में मत लिखो:
अपने संपादक जी से भी बात की, कई दोस्तों से भी बात की लेकिन वो बोले यह सब अंधविश्वास है इसलिये इस विषय में मत लिखो। स्वप्न विज्ञान का मुझसे बहुत गहरा नाता है। इसकी शुरूआत कक्षा आठ पर देखे गये स्वप्न के हकीकत में बदलने की प्रक्रिया से हुई और लगभग आज की उम्र तक ऐसे कई सपने हकीकत में सच हुए। 3 मई तक लॉकडाउन का भी स्वप्न प्रथम लॉकडाउन के लागू होने के तुरंत बाद आ गया था जिसके बारे में भी अपने कई जानने वालों से कहा तो वो समझे कि पत्रकार होने के नाते इन्हें कुछ ज्यादा पता होता है। मन ने कई बार कहा, कि मैं लोगों के बीच अपनी बातों को लेकर आऊं लेकिन तब भी हिम्मत नहीं कर पाया। लेकिन कुछ और बातें भी सच होती नज़र आ रही हैं तो लगता है कि मैं रामचरित मानस की उन बातों को शेयर करूं जिन-जिन दोहों पर लाल-भूरे रंग के बाल मिले और उनकी व्याख्या कुछ आज के तरीके से भी रखूं, तो कई रहस्यों से हो सकता है पर्दा उठ जाये।
हमारे यहाँ पूजी जाने वाली रामचरित मानस से भी भूरे-लाल रंग के बाल निकले। जिन-जिन दोहों या चौपाईयों के पास से ये बाल निकले उन दोहों व चौपाईयों का अर्थ तब के संदर्भ में और आज के संदर्भ में दोनों के तार जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, यह प्रयास कहाँ तक सही होगा कहा नहीं जा सकता। लेकिन जनहित व विश्वहित के लिये सोचना मेरा भी कर्तव्य है और मैं उसी कर्तव्य के निर्वहन का पालन कर रहा हूँ। अगर इनसे संबंधित बातें गलत होती हैं तो वो मेरे विश्लेषण करने का तरीका ही गलत होगा। बाकी रामचरितमानस की गूढ़ता पर किसी को कोई शक नहीं है। अगर अच्छा विश्लेषणकर्ता मिल जाये तो हो सकता है सबकुछ सही से भी विश्लेषण कर सके। खैर मैंने जो विश्लेषण की कोशिश की वो आप सबके समक्ष है। रामचरित मानस तो सदा से पावन थी और सदा पावन रहेगी। मेरे यहाँ रखी श्रीरामचिरत मानस में पहला बाल, बालकाण्ड के 69 दोहे व उसके नीचे की चौपाई के पास से मिला-
“जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥69॥“
भावार्थ:-यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान से इस प्रकार होड़ करते हैं, तो वे कल्पभर के लिए नरक में पड़ते हैं। भला कहीं जीव भी ईश्वर के समान (सर्वथा स्वतंत्र) हो सकता है?॥69॥
आज विश्व व्यापी विपदा के संबंध में इसका भावार्थ भी सही ही है..विज्ञान की कुछ अधूरी उपलब्धियों को लेकर मनुष्य खुद को ईश्वर समझने लगा था लेकिन एक छोटे से न दिखने वाले वायरस ने पूरे विश्व के मानवों को जरूर यह समझाने के लिये विवश कर दिया है कि ईश्वर, ईश्वर है।
चौपाई :
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥1॥
भावार्थ:-गंगा जल से भी बनाई हुई मदिरा को जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है॥1॥
इस महामारी के संदर्भ में मेरे विवेक से इसका भावार्थ ये भी निकला कि इस कोविड-19 का वैक्सीन या दवा किसी पावन चीज से ही बननी है ऐसी किसी चीज से आप गलत दवा भी बना सकते हैं लेकिन जब पावन चीज की मात्रा का प्रयोग अधिक होगा तो यह दवा की तरह भी काम कर सकती है। यह पावन चीज इस प्रथ्वी में कुछ भी हो सकती है। दो विरोधाभास चीजों से मिलकर यह दवा आसानी से बन सकती है।
दूसरा सुनहरा बाल बालकांड के 71वें दोहे के पास मिला जिसका अर्थ निम्नवत है-
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥71॥
भावार्थ:-हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्री भगवान का स्मरण करो, जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे॥71॥
चौपाई :
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावनु देहू॥
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥1॥
भावार्थ:-अब यदि तुम्हें कन्या पर प्रेम है, तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे, जिससे शिवजी मिल जाएँ। दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा॥1॥
यहाँ मेरे विवेक ने जो कार्य किया वो ये कि कोई फीमेल डॉक्टर या वैज्ञानिक ही अपने तप से इस महामारी का हल निकालेंगी, इन्हें पुरुषों की अपेक्षा जल्द सफलता मिलेगी। 64 पेज व 71वें दोहे से यह अर्थ निकल रहा है कि दवा सितंबर माह तक बन सकती है। (64+71=135=1+3+5=9, अर्थात सितम्बर माह में दवा या वैक्सीन बनने का शुभ कार्य हो जायेगा यदि चौपाई 1 को भी जोड़ा जाये तो अंक 10 मिलता है जो अक्टूबर को भी दर्शाता है)
एक तीसरा सुनहरा बाल बालकांड के 156वें पेज के पहली चौपाई व 157वें पेज की तीसरी चौपाई के बीच से मिला।
156वें पेज की पहली चौपाई–
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी।।
हरषित जहाँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी।।
भावार्थ- राम जी के जन्म के बाद उनके रोने की ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आयीं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनंद में मग्न हो गये।
आज के संदर्भ में इस चौपाई का भावार्थ- दवा का अविष्कार हो चुका होगा और विश्व आनंद की साँस लेगा, कोविड-19 का सही ईलाज जुलाई से अक्टूबर के मध्य खोज लिया जायेगा। (1+5+6+1=13=1+3=4 महीने बाद तथा अन्य पेज से 1+5+7+3=16=1+6=7 महीने बाद) भारत में मध्य मार्च में आमजन ने इसके बारे में जाना। तो मार्च से 4 महीने से 7 महीने तक के बीच में इसकी प्रभावी दवा या वैक्सीन बनकर तैयार हो जायेगी।
रामचरित मानस के अन्य काण्डों से भी आठ सुनहरे भूरे बाल मिले जो दवा बनने के बाद व कोरोना की भयावहता सहने के बाद के भारत व विश्व के बारे में और कई जानकारियाँ दे रहे हैं। जिन दोहों व चौपाईयों में यह सुनहरे बाल मिले, उनके भावार्थों को बताते हुए आज के संबंध से भी तार जोड़ने के प्रयास करेंगे। …गतांक से आगे..
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