सौम्यता के साथ वीरता का संदेश देता है नवरात्रि का तीसरा दिन
अलका शुक्ला
चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन चेतना के उस पड़ाव का प्रतीक है, जहाँ शांति और युद्ध का एक अद्भुत समन्वय घटित होता है। प्रथम दो दिनों की स्थिरता और तपस्या के बाद, तृतीय सोपान पर ‘माँ चंद्रघंटा’ का प्राकट्य होता है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जो न केवल इनके नाम का आधार है, बल्कि मन की एकाग्रता और समय की निरंतरता का भी सूचक है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, जब महिषासुर जैसे राक्षसों का आतंक बढ़ा, तब माँ ने यह रौद्र और कल्याणकारी स्वरूप धारण किया। दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र और गले में पुष्पों की माला धारण किए हुए माँ का यह रूप एक साथ सौम्यता और वीरता का संदेश देता है। यह दिन हमें सिखाता है कि साधक को केवल भीतर से शांत ही नहीं, बल्कि बाहर की बुराइयों से लड़ने के लिए उतना ही सजग और साहसी भी होना चाहिए।
शांति का अर्थ कायरता नहीं है, बल्कि शांति की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने की सामर्थ्य रखना ही है वास्तविक शक्ति
आध्यात्मिक गहराई में उतरें तो माँ चंद्रघंटा का संबंध हमारे शरीर के तृतीय ऊर्जा केंद्र ‘मणिपुर चक्र’ से है, जो नाभि स्थान पर स्थित है। योग शास्त्र में इसे ‘अग्नि तत्व’ का केंद्र माना जाता है, जहाँ से हमारे आत्मविश्वास, साहस और पाचन शक्ति का संचालन होता है। मूलाधार और स्वाधिष्ठान से ऊपर उठी ऊर्जा जब मणिपुर चक्र पर पहुँचती है, तो साधक के भीतर का भय समाप्त होने लगता है और उसे दिव्य ध्वनियों का अनुभव होने लगता है। माँ के हाथ का ‘घंटा’ उस नाद ब्रह्म या ब्रह्मांडीय ध्वनि का प्रतीक है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट कर एकाग्रता को बढ़ाती है। मणिपुर चक्र का संतुलित होना व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और नेतृत्व क्षमता प्रदान करता है, जिससे वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।
इस स्वरूप के पीछे छिपा वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार आज के तनावपूर्ण युग में अत्यंत प्रासंगिक है। माँ चंद्रघंटा का ‘घंटा’ ध्वनि विज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जिस प्रकार मंदिर के घंटे की ध्वनि मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों को संतुलित करती है और विचारों के कोलाहल को शांत करती है, ठीक उसी प्रकार माँ की साधना मानसिक एकाग्रता बढ़ाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से मणिपुर चक्र का संबंध हमारे एंटरिक नर्वस सिस्टम से है, जिसे ‘दूसरा मस्तिष्क’ भी कहा जाता है। इस केंद्र की सक्रियता से पाचन तंत्र सुधरता है और मेटाबॉलिज्म संतुलित होता है, जिससे शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ता है। मनोविज्ञान के स्तर पर, यह देवी स्वरूप हमें एंगर मैनेजमेंट और साहस का पाठ पढ़ाता है, अर्थात क्रोध का उपयोग विनाश के लिए नहीं बल्कि अन्याय के विरुद्ध सृजन के लिए करना।
तीसरे दिन के लिए धूसर या सुनहरा रंग अंधकार और प्रकाश के बीच के संतुलन को दर्शाता है। यह रंग तंत्रिका तंत्र को शांत रखने और आत्मविश्वास को जागृत करने में सहायक होता है। इस दिन की उपासना वास्तव में हमारे भीतर छिपे डर को साहस में बदलने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। माँ चंद्रघंटा का संदेश स्पष्ट है कि शांति का अर्थ कायरता नहीं है, बल्कि शांति की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने की सामर्थ्य रखना ही वास्तविक शक्ति है। यह साधना का वह पड़ाव है जहाँ साधक अपने अहंकार और भय को भस्म कर एक योद्धा की भाँति आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।







