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    Home»करियर»Education

    भाषा को मनीषियों ने पहले ही रोजगार से जोड़ा, भाषाविद् कभी बेरोजगार नहीं होता: योगी आदित्यनाथ

    By February 22, 2020 Education No Comments7 Mins Read
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    लखनऊ विश्वविद्यालय में दो दिवसीय भारतीय भाषा महोत्सव की हुई शुरूआत

    आज भाषा को रोजगार से जोड़ने की बात की जा रही है, लेकिन यह बात करने वाले विद्वानों को यह जानने की जरूरत है कि मनीषियों ने इसे बहुत पहले ही रोजगार से जोड़ रखा है। भाषाविद् कभी बेरोजगार नहीं होते। आज हम अपने को पहचानने की भूल कर रहे हैं। संस्कृत पढ़ने वाला कभी भूखों नहीं मर सकता। हमें शब्द की ताकत को पहचानना होगा। हमें भाषा के शास्वत स्वरूप को पहचानने की जरूरत है। ये बातें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कही। वे शनिवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में भारतीय भाषा महोत्सव-2020 के उद्धाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।

    देश के बड़े भू-भाग को जोड़ने का कार्य करती है हिंदी

    उन्होंने कहा कि देश के बड़े भू-भाग को जोड़ने का कार्य ‘हिंदी’ करती है। इसीलिए जब महात्मा गांधी के हाथों में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व आया तो उन्होंने प्रखरता से कहा कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है। उन्होंने हिंदी को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने की वकालत की। महात्मा गांधी ने पूरे देश का भ्रमण किया और हिंदी के माध्यम से सभी को जोड़ने का प्रयास किया। जिन अंग्रेजों के बारे में कहा गया कि उनके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता, उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर लेकर देश से भागना पड़ा।

    ब्रह्म सत्य और शाश्वत है

    भाषा के शाश्वत रूप को पहचानना और उसके अनुरूप लोगों के लिए सुलभ बना देना ही अमर कृति का निर्माण करता है। जहां पर भी शब्द द्वारा हमारे साहित्यकारों ने इस ब्रह्म तत्व को समझने का प्रयास किया है, वहीं शब्द ‘ब्रह्म’ बन जाता है। शब्द को जिस भावना से कहा गया वही उसकी ताकत को बढ़ाता है। भारतीय मनीषा ने शब्द को ‘ब्रह्म’ कहा है। ब्रह्म सत्य है और शाश्वत है। साहित्य की एक लंबी कहानी है। हम भारतवासियों को गर्व होना चाहिए कि दुनिया को साहित्य का पाठ हमने पढ़ाया है। दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ भारत ने दिया।

    लौकिक संस्कृति का दुनिया में सबसे बड़ा महाकाव्य भारत ने दिया

    एक सामान्य व्यक्ति के मन में एक भावना फूटती है, अचानक उसके मुंह से एक श्लोक फूट पड़ता है और दुनिया के सबसे महान काव्य ‘रामायण’ की रचना होती है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से संबंधित जो कुछ भी है, वह इस ग्रंथ में है, और जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र कहीं नहीं है। लौकिक संस्कृति का दुनिया में सबसे बड़ा महाकाव्य भारत ने दिया है। ‘महाभारत’ के रूप में एक ऐसा ग्रंथ भारतीय मनीषा ने दिया है जिसमें पूरे दम के साथ यह कहने का साहस है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह चार मानवीय पुरुषार्थ हैं।

    श्रीरामचरितमानस किसी बंधन में नहीं बंधा

    तुलसीदास जी ने अवधी में श्रीरामचरितमानस के माध्यम से बहुत कुछ दिया। भक्ति के माध्यम से देश की स्वाधीनता की शक्ति को जगाने की ऊर्जा श्रीरामचरितमानस ने दी। श्रीरामचरितमानस किसी बंधन में नहीं बंधा है। यह हिंदी, संस्कृत, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ में रचित है। रामचरित मानस अवधी में है, लेकिन सबके दिलों को जोड़ने का काम करता है। उन्होंने भाषा की गरिमा की व्याख्या करते हुए कहा कि तुलसीदास जी के मन में भक्ति का भाव जागृत हुआ और रामचरित मानस के रूप में दुनिया को सब कुछ दे दिया। वह अवधी में होने के बावजूद किसी बंधन में नहीं बंधा। वह हर जगह पूज्यनीय है।

    अवधी को भले ही भारतीय संविधान ने मान्यता न दी हो लेकिन भारत का जन-जन प्रतिदिन समर्थन देकर श्रीरामचरितमानस पढ़ता है। यह भारत की वास्तविक ताकत है और हमें इसे पहचानना होगा। मेरा मानना है कि हम आज भी अपने आपको पहचानने में भूल कर रहे हैं।

    पुरोहित को लोग दक्षिणा देने के साथ पैर छूकर करते हैं सम्मान

    संस्कृत का व्यक्ति पुरोहित का कार्य करता है तो लोग उसे दक्षिणा भी देते हैं और पैर भी छूते हैं, इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता। भाषा, रोजगार का बहुत बड़ा माध्यम है। संस्कृत को भारत के ऋषि बहुत पहले रोजगार से जोड़ चुके हैं। मेरा मानना है कि संस्कृत पढ़ने वाला व्यक्ति कभी भूख से नहीं मर सकता, बशर्ते वह अपनी बुद्धि का उपयोग सही ढंग से करे।

    महात्मा गांधी की टिप्पणी से प्रभावित हुए प्रधानमंत्री,काशी विश्वनाथ मंदिर का शुरू हुआ जीर्णोद्धार

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी विश्वनाथ मंदिर जाने के मार्ग के चौड़ीकरण के संदर्भ में बताया कि यह गांधी जी द्वारा विश्वनाथ मंदिर पर की गयी एक टिप्पणी का परिणाम है, जिससे प्रधानमंत्री के मन में ऐसा विचार आया जो आज साकार हो रहा है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने कहा, 1916 में महात्मा गांधी जी काशी हिन्दू विवि में आये थे और वे मंदिर भी गये। गांधी जी वहां गंदगी देखकर दंग रह गये। गांधी जी ने बहुत तीखी टिप्पणी की कि कैसी गंदगी है, कितनी मक्खियां हैं। उसका स्मरण कर प्रधानमंत्री ने हम सभी से कहा कि देखो उनकी बात को सुनो और 100 साल बाद भी कोई अंतर दिखाई दे रहा है। आगामी सत्तर वर्षों में हमने क्या किया।

    विद्वानों के बीच काम करना कठिन, चैलेंज के रूप में लिया

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं जानता था कि विद्वानों के बीच काम करना बहुत कठिन होता है लेकिन हम लोगों ने इसे चैलेंज के रूप में लिया। हमने कार्ययोजना के अनुसार 300 मकान खरीदे। जिनके अंदर हमने 67 मंदिर पाए। उन्हें संरक्षित किया जा रहा है। आज अगर आप काशी जाएंगे तो आपको 5 फीट नहीं 50 फीट चौड़ा रास्ता मंदिर में जाने के लिए मिलेगा। डेढ़ वर्ष के भीतर जब ‘काशी विश्वनाथ धाम’ की प्रधानमंत्री मोदी की परिकल्पना पूर्ण होगी, तब काशीवासियों को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोगों को भारत में भगवान विश्वनाथ का ऐसा पवित्र धाम मिलेगा, जैसा उनके धाम को होना चाहिए।

    पंडागिरी से लोग होते परेशान, समस्या का किया समाधान

    उन्होंने कहा कि मंदिरों में जाने पर लोग जबरदस्ती रक्षासूत्र बांधकर होने वाली पंडागिरी से बहुत परेशान होते थे। हमने इस समस्या का भी समाधान निकाला। हमने तय किया कि कोई भी पंडा या पुरोहित अपने अनुसार पूजा नहीं करवाएगा। एक ट्रेनिंग सेंटर वहां बनाया है। वहां एक सुगम स्थान खोला गया। वहां श्रद्धालु को जो भी सुविधा चाहिए, उसके लिए गाइड के साथ ही रूद्राभिषेक कराने की भी व्यवस्था की गयी। वह पैसा किसी भी व्यक्ति से नहीं लेगा। पहले चरण में हम लोगों ने तीस लोगों को रखा। आज पांच सौ से ज्यादा गाइड हैं। उसके माध्यम से पूजा व दर्शन भी कराते हैं। कोई जबरदस्ती नहीं है। यह हर मंदिर में संभव है।

    दुनिया के अधिकांश विवि पढ़ाना चाहते हैं संस्कृत

    उन्होंने कहा कि आज दुनिया के ज्यादातर विवि ऐसे हैं, जो संस्कृत पढ़ाना चाहते हैं। दुनिया में शिक्षकों की कमी है। दुनिया के अनुसार अपने आप को तैयार करना होगा। उसके बाद दुनिया में अपने अनुसार चयन करना जरूरी है। आप भाषा ज्ञान से भी देश या दुनिया में रोजगार पा सकते हैं। समग्रता के साथ सोचने की जरूरत है। आज भाषा विश्वविद्यालय क्यों नहीं बन सकता, जिसमें उर्दू भी हो, अरबी भी हो, हिन्दी भी हो, दुनिया की मांग के अनुसार अपने को एक चेन तैयार करनी होगी। हर क्षेत्र में व्यापक संभावना है। भाषा एक माध्यम है लेकिन भाव सबके एक हैं। वह भाव है, भारतीयता। सभी का सम्मान करे और उसकी समृद्धि को देखें। उस दिशा में कार्य प्रारंभ किया जा सकता है।

    इस अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक राय ने विश्वविद्यालय में शुरू हुए नये कार्यों के बारे में बताया। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. राजनारायण शुक्ल ने इस आयोजन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

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