“एक आदमी और एक औरत का बिना गाइड के प्रवेश वर्जित है”

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एक लघु (अ)प्रेम कथा - 1025 वा दरवाज़ा:

बड़ा इमामबाड़ा, भूल – भुलैयाँ के इस ‘वर्जित’ पर वर्जपात कर सलमा और राधेश्याम टिकिट में छेद होते ही जीने से तपाक, सबसे ऊपर चढ़ गए। 1024 दरवाज़ों की इस पहेली में सलमा गुम हों जाना चाहती थीं और अहमक़ राधेश्याम लगा था खोजने की बाहर निकालूँ इसे, तभी तो साबित कर पाऊंगा अपनी बुद्धिमत्ता।

सलमा ने तेजी से भागते राधेश्याम का हाथ थामा और कहा “थोड़ी देर ठहर जावो।

राधेश्याम एक दरवाजे के अंदर घुसा, 7 सेकंड में ही वापस आ गया।

“ये तो आगे से बंद है सलमा” उसने पानी की बोतल सलमा के हाथों से ली और आधी खाली कर गया।

“राधेश्याम, कई दरवाजे अब भी खुले है, तुम देखो तो” सलमा की आवाज़ में बारिश के पहले नाचते मोर की चपलता थी।

राधेश्याम ने जेब से एक कुछ कागज़ात निकालते हुए कहा “सलमा कुछ लिखा है तुम्हारे लिए

मैं तुम्हारा नाम पुकारूंगा
और इंतज़ार करूँगा
उसका पहाड़ों से लौटने तक ।

मैं तुम्हारा नाम लिखूंगा
और इंतज़ार करूँगा
उसका कविता बनने तक ।

सलमा की उंगलियाँ, राधेश्याम की हथेली पर टहलने लगी। उसकी आंखें राधेश्याम के चेहरे पर अंटार्कटिका के बर्फ सी जम गई। राधेश्याम ने हाथो से परचा पलटा और उंगलियों का हथेली से गठबंधन टूट गया। उसकी आंखें पर्चे पर थी, पर्चे की सलमा पर और सलमा की उसपर।
“सुनो राधेश्याम, सुनो” सलमा बुदबुदाई ।

मैं तुम्हारी आवाज़ सुनूँगा
और इंतज़ार करूँगा

“रहने दो” सलमा ने जोर से कहा और पीछे मुड़ कर चल पड़ी।

“क्या हुआ? अच्छा नहीं लिखा”?

“तुम आशिक़ नही बन सकते राधेश्याम, तुम कवि बन जावो”

“ओह्ह, और वो 1024 दरवाज़े!”

“1024 दरवाज़ों से निकलने का राज़ जानती हूँ, मैं तो 1025वा दरवाज़ा ढूंढ रही थी राधेश्याम” ।

(राधेश्याम सर खूंजाते हुए सलमा के पीछे चलने लगा। दोनों बाहर निकले जहाँ पर लिखा था

“”एक आदमी और एक औरत का बिना गाइड के प्रवेश वर्जित है”

सलमा ने वहाँ ख़ड़े एक प्रहरी की ओर गुस्से भरी निगाह से देखा और कहा “नियम का पालन किया करो”)

– नागेश (लखनऊ भ्रमण -3)

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