Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Sunday, May 31
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»साहित्य

    ग्राम्य मंथन – नेपथ्य में संभावना है: नागेश

    By July 29, 2017 साहित्य No Comments8 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 584

    शकील बदायुनी का एक शेर है

    “मुझे आ गया यक़ीं सा कि यही है मेरी मंज़िल
    सर-ए-राह जब किसी ने मुझे दफ़अतन पुकारा”

    ग्राम्य मंथन, वह जगह जो गुजिस्ता कुछ महीनो से जेहन में बस सी गई थी और दफअतन पुकार रही थी | मैं फ़िर से गुनगुनाना चाहता था “झूठा माई थारो बाप, झूठा सकल परिवार, झूठा कूटता छाती” मैं मेरी बेसुरी आवाज़ में गाना चाहता था “किसी की मुस्कुराहट पर हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, जीना इसी का नाम है” | मैं चाहता था कि मुझे तन्मयता से बिना गीता पर हाथ रखे सुना जाए | मैं देखूं तो परिवर्तन देखूं, मैं महसूस करू तो हो समानुभूति, मैं अगर कान दूँ तो जजमेंट से परे हो, मेरे अतिरेक में भी हिचकिचाहट का घर न हो|

    तो जनाब हम अवध एक्सप्रेस के ज़नरल डिब्बे में सवार, पहुच गए 748 किलोमीटर दूर कानपुर सेंटल | घर से दूर एक घर होना इस बात का साक्ष्य है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संभावना अभी शेष है | प्रखर भैया के घर में आ बसे टीम के ग्यारह सदस्य उसे एक ऑफिस में तब्दील कर देते है | फ़िर शुरू होती है वो प्रक्रिया जिसका हिस्सा भारत से आये दो दर्जन लोग बनने जा रहें है | ये प्रयोगिक कार्यशाला के माफ़िक है जहाँ भट्टी में पहले उस लोहे को तपाया जाता है जिस से बनने वाला है हथोड़ा, ताकि जोहरी भट्टी की गरमाहट से मुखातिब हो जाएं| मैं था अपने कुछ सवालो की खोज में, ग़ालिब फरमाते है कि

    “क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब
    आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की”

    इब्तिदा में ये बात साफ़ हो जाती है कि वादे, वादे खिलाफी का सबसे बड़ा तमगा है और उम्मीद, तश्नगी की सबसे बड़ी कसूरवार | तो जनाब ये जो सर्कल है ये इस बात को चस्पा कर रहा है कि जहाँ तुम हो वहां हम है और वहीँ सब है | अगर आप इस बात के कयास लगा रहे है कि इस हिमालय से कोई गंगा निकलेगी तो आपको ख़ुद चलकर देखना पड़ेगा| जब तक आपके नाख़ून उस में डूबेंगे नहीं, आप के पाँव ठंड से ठिठुर नहीं जाते और पसीने की बू जब तलक न पसंद आने लगे उसमे और आप में वहीँ अन्तर है जो आप माउंट एवेरस्ट पढ़ खड़ी बछेंद्री पाल और हम में हैं | ये एक औपचारिक यात्रा बिलकुल नहीं है, ये अनवरत है | एकला चलो रे …एकला चालो रे ..|

    कितनी दफ़ा हमने गुजारी जिंदगी को आइसोलेसन से हटकर पूर्ण एक रूप में देखने की कोशिश की? “सो ग्राम ज़िदगी” के मायने विभिन्न स्तर और हालत के दरमियाँ बदलते और बिगड़ते रहें| मेरी आंखे बीते तीन महीनो में हुए ब्रेकअप, प्यार, इमोशन, रोजगार में उलझकर रह गई| उसकी बिनाई को दुरस्त करने की बजाय में बिछाता रहा परदे, मैंने उन दृश्यों से आँखे फेर ली जो मुझे असहज करते हैं, मैं हक़ीकत को नकारता रहा ताकि खुशफ़हमी की शरण में जी सकूँ | जाने कितने खूबसूरत लोग मेरी जिंदगी का हिस्सा रहें, और कब मैंने उन्हें याद किया| एक पेज पर उतरी हुई जिंदगी वो आइना है जिसे वक़्त- बेवक्त टटोलते रहना चाहिए क्योंकि अमूमन हम खुद से वाकिफ़ नहीं होते|

    गाँव में कई मर्तबा ऐसा होता है कि जब आप गलत जूते या चप्पल पहन लो जो आपके पैरो के मुताबिक न हो तो वो आपको काटने लगते है और वहां पर एक घाव जन्म ले लेता है| आमतोर पर हम जिंदगी में कब किसी के जूतों में इस कदर प्रवेश कर जायें कि उस घाव का महसूस करने लगे| यही समानभूति है और व्यवहारिक और शाब्दिक भाषा में ये सहानभूति से परे है| सहानभूति आदमी को कमजोर करती है और समानभूति मजबूत | ये संजीदगी, ये अहसास और इस बात की अनुभूति बिना उन्हें समझे आना नामुमकिन हैं|

    कानपूर से लगभग 75 किलोमीटर दूर एक गाँव और बारात शाला जहाँ मेहमान, मेजबान का स्वागत करते है | सब से बड़ी हक़ीकत ये ही कि हम नही जानते कि किस कदर हम उनके बदलाव में सहायक है लेकिन हम इस बात से अच्छी तरह वाकिफ़ है कि वो उनकी भागीदारी हमारे बदलाव का हिस्सा हैं|

    एक रात, उस गांब में जहाँ आप पहली दफ़ा कदम रख रहें हो और आपके परिचित कोई भी आपके सामने नहीं होते, हो सकता है कि जेहन में खोफ का आलम हो, नजरो में भरोसा न हो और आसमां से तारे आपकी आँखों में झांक रहे हो और जुगनू टिमटिमा रहें हो | जहाँ शशांक तारो को देखते हुए इस बात का विचार करता है कि एक ओर गाँव में बिजली नहीं है और दूसरी ओर ये खूबसूरत खुला आसमान, जहाँ मुंबई से आई एक लड़की भरपेट खाना नहीं मांग पा रही हो और संभव है स्वछता अभियान के गांधी के चश्मे को नजरंदाज कर आप लोटा लेकर कहीं बैठे हो और हल्के भी न हो पायें| खैर इसका उलट भी संभव है| उस रात का सवेरा सब के लिए एक नया सवेरा होता है|

    ये दुनिया तेजल दी की सुनाई कहानी की तरह ही है जहाँ सूप बन रहा है और दिलचस्प बात ये है कि हर वक़्त गेंद आपके ही पाले में है, अब सवाल ये है कि आप इस सूप की बेहतरी के लिए क्या कर सकते है| ब्लू और रेड में से हर दफ़ा चुनाव आपके सामने है आप कौनसी ऊँगली थामेंगे? इस से पहले सूप जलकर ख़ाक हो जाए और आप मूकदर्शक बने रहे तो आपकी जिम्मेदारी का क्या ? आपकी आँखों का क्या ? प्याज़, गोबी न हो तो छोडिये अलबत्ता में तो नमक लेकर भी दौड़ लगा दूँ|

    सेवा, फिक्सिंग और मदद के बीच जो महीन लाइन है वो एक बड़ा खाली स्थान लिए हुए है| किस तरह मदद करना सेवा से परे है और जब आप सेवा करते है तो केवल आपकी ताकत ही नहीं वरन आपकी कमजोरियां भी सेवा में लग जाती है| रेचल आगे कहते है कि सेवा के मूल भाव में हम सब जुड़े हुए रहते है हमारे दुःख हमारे सुख सब| सेवा हमें हमारी पूर्णता व इसकी शक्ति का एहसास कराती है। सेवा हमें हमारी पूर्णता व इसकी शक्ति का एहसास कराती है।

    ये छोटी पलिया गाँव है जहाँ के सात साल का एक बच्चा शनि आपकी एनर्जी पर सवाल उठा सकता है| वो सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक आपके आगे आगे दौड़ता हुआ मिल जाएगा| जब आप थक कर खाना खाने लेने के बाद अनमने मन से उठने को तवज्जो न दे रहें होंगे तभी वो पूछ लेगा भैया अमिया खाने चले? और आप दूर खड़े आम के पेड तक जाने की बजाय थोडा सुस्ताने लगे तो वो अपने साथियो के साथ कुछ देर में हाज़िर होगा और आपके हाथो में थमा देगा छोटी छोटी पांच अमिया| जहाँ कि प्रिया, प्रियंका की आवाभगत आपको विस्मित कर देगी| जहाँ एक झोपडी नुमा जगह पर मास्टरजी बतियाते हुए मिल जायेंगे| गाँव वालो के बर्तन, छोटू भैया का खाना और मंदिर के पास वाले हेंडपंप का पानी |

    सुधा और ईश्वर, दो ऐसे युवा जिनसे प्रभावित हुए नहीं रहा जा सकता | अपने घर में जीरो वेस्ट की तर्ज पर रहने वाले एक तालब को पुनर्जीवित करने की तमन्ना लिए ये चेन्नई से कानपूर के गाँव गंगाधार निवादा पहुँच जाते है| उनकी आँखों के तन्नी, तन्नी के लिए निकल आती है| उनकी बातो में सादगी का परचम होता है और संजीदगी की हवा बहती रहती है| उनकी आवाज हमेशा निर्माण की तरफ और उनकी ख़ामोशी निर्वाण की तरफ ले जाती है| तालाब को दो अलग अलग रूप में देखना और कचरा बम को विभिन्न जल के स्त्रोतों में डालना उनके बिना संभव नहीं था|

    हम खुद के एक्शन से कितने अनभिज्ञ होते है? क्या हम जानते है कि एक कप कॉफ़ी में 140 लीटर और एक जोड़ी जूतों में 8000 लीटर पानी खर्च होता हैं| हम खुद को उस रूप में स्वीकार करने में कितने सहज है जहाँ हम गलत है | हम हमारी कमजोरियों को क्या उसी तरह देख सकते है जैसे हम हमारे मजबूत पक्ष को देखते है|

    वक़्त है कि थोड़ा ठहर कर जवाबो में सर खपाने की बजाय सवालों की तरफ थोडा ध्यान दिया जायें | जौन एलिया साहब का एक शेर है कि

    “कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
    इतना आसान है पता मेरा”

    प्रखर भैया माउथ आर्गन लिए और अपनापन, तेजल दी के डीजेम्बे की गूंज के साथ गहरी समझ , शशांक की उंगलियों से निकलती कलिंगा की ध्वनि और भिन्न सुविचार, माल्लिका के हाथो में बजती टफरी उलझता मूवी मेकर, रक्षा के थिरकते हाथ, सुधा की मुस्कराहट, ईश्वर की कहानियां, आकांशा की रंगोली और संध्या की बाते, नींद और खाना और अनिशा की भागदोड़ ने एक ऐसे मंथन की नीव रखी जहाँ आयें 26 शख्स अपने आप को चन्द दिनों में अंकुरित महसूस कर सकें| इस अंकुरण का पेड में बदलना एक लम्बी प्रक्रिया है लेकिन शुरुआत जरुरी है|

    मुझे व्यक्तिगत रूप से ग्राम्य मंथन एक कविता लिखने के माफ़िक लगता है जिसकी सर्जन प्रक्रिया के लिए उस से गुजरना बेहद जरुरी है| इसके अनुभव इतने गाड़े है कि उन्हें किसी तरल पदार्थ की तरह आप बहा नहीं सकते | ये वो खुशी है जो मुझे अपनी पहली रोटी तवे पर फूलने पर हुई थी, ये वो आंसू है जिसे बरसो पहले में गिराना चाहता था|

    बहरहाल एक गीत चल रहा है, आप भी सुनिए

    “उठो कबड्डी कबड्डी खेले सरहदों पर
    जो आयें अबके तो लोटकर फिर ना जाए कोई
    इन लकीरों को जमीं पर ही रहने दो
    दिलों में ना उतारे”

    -नागेश की वॉल से 

    Keep Reading

    But this is Banda, everyone here will melt in the heat of selfishness...

    मगर ये बांदा है, स्वार्थ की गर्मी में यहां सब पिघल जायेंगे…

    सत्य और साधना का आध्यात्मिक प्रेम, आज के दौर का दुर्लभ प्रेम

    The sacred soil of Pakharouli—bearing witness to a history that speaks for itself...

    पख़रौली की पावन माटी, जिसका साक्ष्य सुनाती है…

    A legacy of grace and simplicity—it is a heritage that stems directly from him.

    अदब और सादगी की, उन्हीं से एक विरासत है..

    Hayatullah Ansari's 125th Birth Anniversary: ​​A Beautiful Confluence of Memories in Lucknow

    हयातुल्लाह अंसारी की 125वीं जयंती: लखनऊ में यादों का सुंदर समागम

    Please craft an interesting, concise news item—and ensure it is not a duplicate.

    दर्शकों को भावनाओं में डुबो गया साहिर-अमृता का अनकहा प्रेम

    Add A Comment
    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    A Flight of Courage

    हौसले की उड़ान

    May 30, 2026
    Bashir Badr: King of Lions, Farewell That desolate silence—he was right when he said it: these were salutations born of self-interest.

    बशीर बद्र: शेरों का बादशाह, फिर भी विदाई में सूना सन्नाटा, सही कह गए थे – ये मतलबों के सलाम थे

    May 30, 2026

    नई रिपोर्ट भारत के 11000 किलोमीटर लम्बे तटीय क्षेत्र पर मंडराते जलवायु संकट की चेतावनी देती है

    May 30, 2026
    Lucknow Breaking: Tin shed collapses at Charbagh Railway Station, causing panic on platform!

    लखनऊ ब्रेकिंग: चारबाग रेलवे स्टेशन पर टिन शेड गिरा, प्लेटफॉर्म पर मचा हड़कंप!

    May 29, 2026
    The Shikanji Bhandara in Aliganj will continue until the end of June.

    जून के आखिर तक चलेगा अलीगंज में शिकंजी भंडारा

    May 29, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading