पागल बुढ़िया

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1938
भिंडी लेलो, गोबी लेलो
भिंडी लेलो, गोबी लेलो
वो साक्षी की माँ, ले ले रे
ऐ भगवती ले ले रे
सब्जी वाला आया हैं।
जैसे ही कोई आता है गली नंबर 12 में
सब्जी वाला, आइसक्रीम वाला, दूध वाला
पागल बुढ़िया चिल्लाने लगती है
ओटले पर पड़ी पड़ी ।
गली में होती रहती है चर्चा कि
बुढ़िया जवानी में कहर ढहाती थी
उसके नितंब का कोई तोड़ नही था
उसकी आंखें सूरज की रिश्तेदार थी
कहते हैं एक बार पुजारी ने भी
उसकी छाती को दबा दिया था।
सट्टे खेलने वालों को वो देती थी गालियां
उन्हें पकड़ने के बहाने पुलिस आती रहती थी।
वो किशोरों की माधुरी
युवाओ की जवानी
बुजुर्गों की ठरक थी।
तीन पीढ़ियों की नज़र उसपर होती थी
ग़नीमत है उसने कभी चुनाव नही लड़ा।
जिसे तुम कह सकते थे अपना
सरकारे कहने लगी शरणार्थी।
वो पेशावर की राजधानी
अब भी दिल्ली बताती हैं।
वसुदेव कुटुम्भ की सबसे ज्यादा हिमायती
मुझे वो बुढ़िया लगती हैं।
उसका पोल्का ढीला पड़ गया था
उसके ऊरोज़ो के सिकुड़न के साथ साथ
लेकिन कम न हुई गिरती नजरो की ठरक।
बुढ़िया आदि हो गई इतना
कि उसे फर्क नही पड़ता
न जिस्म चीरती आँखों का
और ना फटे पोलके का।
मैं देख रहा हूँ जिस दिन बुढ़िया नही रहेगी
कई घरों की सब्जी, दूध और
बच्चो की आइसक्रीम छूट जाएगी।
एक पाकिस्तानी शरणार्थी
हिंदुस्तान की एक गली को
सूना कर सकती है।
कई दिनों पहले सियासतदानों ने
एक मुल्कों को सूना कर दिया था
जिसका ख़ालीपन तीन देश मे भर गया है।
एक बुढ़िया वहाँ चिल्ला रही है
ऐ हुक्मरानों शांति ले लो।
                                       – नागेश

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