पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजी में प्रेसीडेंट और हिंदी में राष्ट्रपति शब्द को ही माना था अधिक उचित
प्राचीन भारत से भारत की स्वतंत्रता तक व्यवहारिक और लिखित रूप से संस्कृति में पुरुष प्रधानता चरम पर रही। इस दौर में ही तमाम पदों को पुरुष प्रधान शब्दों से जोड़ा गया जो आज भी सतत रूप से चलायमान है। संविधान सभा में राष्ट्रपति के पद के लिए राष्ट्रपति शब्द को लेकर कई सदस्यों ने आपत्ति जतायी थी लेकिन संविधान की उद्देशिका और संविधान सभा की कई समितियों के अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने राष्ट्रपति पद के लिए अंग्रेजी में प्रेसीडेंट और हिंदी में राष्ट्रपति शब्द के लिए राष्ट्रपति शब्द पर अपनी सहमति जताई।
जबकि आजादी के बाद देश में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ, जो लोगों में समानता के अधिकार के लिए मानवता के सही आयामों का सृजन करता है। इस आमूलचूल सकारात्मक परिवर्तन के बाद समानता आज भी व्यवहारिक रूप से कोसों दूर है। भारतीय शासन-प्रशासन, औपचारिक और अनौपचारिक संगठनों के कुछ पदों में पति एक सम्मानजनक शब्द हो सकता है तो पदों में पत्नी शब्द को इतना गलत क्यों दिखाया जा रहा है? वो भी सत्तापक्ष और तमाम विद्वजनों की सभा में! पदों में पति शब्द को लेकर आज तक किसी ने सेक्सुअल नजरिये से नहीं देखा तो पदों में पत्नी शब्द को लेकर इतना गलत नजरिया क्यों रखा जा रहा? क्या ऐसे रवैय कभी असमानता की खाई को पाटने देंगे? क्या संविधान की आत्मा और मौलिक अधिकारों में दिये समानता को कभी सही और व्यवहारिक रूप मिल पायेगा?
संविधान जब महिला और पुरुष में बराबरी कर रहा है तो फिर तमाम पद आज भी पुरुष प्रधान नामों पर क्यों है? राष्ट्र का पति राष्ट्रपति ये कैसे जायज है? पति का एक अर्थ स्वामी भी होता है और लोकतांत्रिक देश में भला जनता का या राष्ट्र का कोई स्वामी कैसे हो सकता है? यहां स्वामी शब्द से भी गुलामी वाली ही बू आ रही है। एक राष्ट्र भूमि, जनता और संस्कृति से मिलकर तैयार होता है। अब इन सबके पति से हम किसी व्यक्ति को कैसे नवाज सकते हैं? गलती से ही सही लेकिन कांग्रेस के नेता अधीर रंजन ने पदों में इन शब्दों को सुधारने की एक दिशा दी है। पदों के आगे पति शब्द ही क्यों महान माना गया?? एक अर्थ यह भी निकलता है कि एक व्यक्ति राष्ट्र का पति है तो राष्ट्र के अन्य सभी अवयव पत्नियां हुईं। राष्ट्रपति का पद जरूर महत्वपूर्ण है। पर यहां पद शब्द को लेकर संविधान इतर ही भावनाएं दिख रही हैं।
संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक न्याय और समता का स्पष्टत:उल्लेख है। महिला सशक्तिकरण पर काम कर रहे लोगों ने भी इस विषय को लेकर इस पर आज तक कोई आवाज नहीं उठाई। लेकिन यह पद शब्द समय समय पर प्रासंगिक हो ही जाता है। कुछ लोगों का कहना है पुनः इस विषय पर संसद में चर्चा हो और महिला पुरुष समानता को ध्यान में रखकर कोई नये शब्द का चयन हो जिससे समानता का भाव भी दृष्टव्य हो। जिससे संविधान में उल्लिखित समानता की मूल भावना और नारी की गरिमा भी बराबरी से महत्वपूर्ण बनी रहे।
- राहुल कुमार गुप्ता







