ऐ बचपन तुझको नमन है

0
937
हर दुःखों का तू तो अंत है।
नई खुशियों का प्रारम्भ है।।
देखा नहीं रब को, पर लगता है।
तुझसे ही परम आनंद है।।
तनाव को छू मंतर करता।
मुस्कान में तेरे वो दम है।।
जीवन को आसान करता।
हर संघर्ष अब तो कम हैं।।
कई रूपों में देता साथ सदा।
‘ऐ बचपन’ तुझको नमन है।।
इस रंगमंच का तू पात्र अहम है।
तुझसे ही उम्मीदें प्रबल हैं।।
आशा की तू वो किरण है।
जो देती जीवन को धड़कन है।।

…आईने में खुद को देख न पाऊंगा मैं

दूरियाँ इस कदर खुद से भी बढ़ा लूँगा मैं।
तुम तो क्या आईने में खुद को देख न पाऊंगा मैं।।
कहीं दिख न जाये मेरी आँखों में सूरत तेरी।
आईने से भी दूरियाँ अब बना लूँगा मैं।।
अब यह एहतराम हो गया तू उड़ सकता आसमाँ में।
टूटे हुए आशियाने में चैन से लौट आऊँगा मैं।
पाओगे नहीं कहीं नामोनिशाँ हमारा।
तेरे जहाँ से खुद को इस तरह मिटा लूँगा मैं।
खुश रहना अब सदा ही सदा।
आँसू पोंछने अब आ न पाऊंगा मैं।।
भूल जाओ भले तुम मुझको जाकर नये जहाँ में।
मेरी इबादत हर मोड़ पे याद आयेगी तुम्हें।।
बस आँखों में अब नमी मत आने देना।
वरना फिर से हर बार की तरह तड़प जाऊँगा मैं।।

तुमसे, तुम्हारे प्यार में

तुमसे, तुम्हारे प्यार से।
साँसें मेरे जहान की।।
धड़कन है मेरे दिल की।
तुमसे, तुम्हारे प्यार से।।
गुम हूँ कहीं मैं तुममें।
खोया वजूद प्यार में।।
खुश हूँ मैं बेइंतहा।
रब को पाया है तुममें।।
तुमसे, तुम्हारे प्यार से।
हर बातें मेरे जहान की।।
तुमसे, तुम्हारे प्यार से।
नाता युगों-युगों का।।
हर रात एक ख्वाब में।
हर दिन इंतजार में।।
इबादत तो हो रही है।
अब बस तेरे दीदार की।।
तुमसे, तुम्हारे प्यार में…
राहुल कुमार गुप्त

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here