भ्रष्टाचार के कारण गोमती आजतक नहीं हो पायी प्रदूषणमुक्त?

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file photo
  • विभिन्न स्थानों पर पानी की जांच हुई तो शून्य निकली आक्सीजन की मात्रा
  • डुबकी लगाना तो दूर आस-पास टहलने लायक भी नहीं गोमती

लखनऊ,26 जून 2019: लखनऊ की गोमती नदी का पानी इतना अधिक प्रदूषित हो गया है कि इसमें डुबकी लगाना तो दूर नजदीक टहलने वाले भी इसकी बदबू से बीमार पड़ सकते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश डीपी सिंह की अध्यक्षता में गठित समिति ने यह सलाह दी है।

गोमती में भयावह प्रदूषण:

पूर्वी यूपी में नदियों व जलाशयों के प्रबंधन एवं अनुश्रवण के लिए गठित इस कमेटी ने सुझाव दिया है कि लोग गोमती में तब तक स्नान न करें जब तक प्रदूषणमुक्त न हो जाए। कमेटी ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) को प्रेषित 81 पेज की आंतरिक रिपोर्ट में कहा है कि अनुपालन गारंटी के रूप में प्रदेश सरकार से 100 करोड़ रुपये जमा कराया जाय।

कमेटी ने प्रदूषण के लिए जिम्मेदार यूपी प्रदूषण बोर्ड पर 6.84 करोड़, जल निगम पर तीन करोड़, लखनऊ नगर निगम पर दो करोड़ तथा गोमती नदी के किनारे बसे दस जिलों के नगर निगम-नगर पालिकाओं पर एक-एक करोड़ रुपये पर्यावरणीय हर्जाना लगाने की संस्तुति की है। कमेटी के सचिव न्यायमूति राजेन्द्र सिंह (पूर्व जिला जज) द्वारा एनजीटी को प्रेषित रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक हस्तक्षेप तथा भ्रष्टाचार के चलते प्रदेश सरकार के अधिकारी अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने में पूर्णतया असफल रहे हैं। इसी कारण गोमती आजतक प्रदूषणमुक्त नहीं हो पायी है।

हाईकोर्ट के पूर्व जज डीपी सिंह की अध्यक्षता में गठित कमेटी की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

कमेटी ने एनजीटी को प्रेषित 12 सूत्री रिपोर्ट में कहा है कि समिति ने गोमती के विभिन्न स्थलों से सेम्पल लेकर पानी की जांच की जिसमें आक्सीजन की मात्रा शून्य पायी गयी। गोमती नदी से सटे 11 जिलों पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, फैजाबाद, सुलतापनुर, प्रतापगढ़ तथा जौनपुर के कलेक्टर लोगों को यह जानकारी दें कि वे गोमती में तबतक स्नान न करें जबतक नदी प्रदूषणमुक्त न हो जाए। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गोमती को साफ रखने में असफल रहा है क्योंकि प्रदूषण के लिए दोषी नगर निगम व नगर पालिकाओं पर पर्यावरणीय हर्जाना अधिरोपिक नहीं किया और न ही उनके विरुद्ध अभियोजन की संस्तुति की है। इसलिए बोर्ड के अधिकारियों को पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के अंतर्गत अभियोजन के लिए उत्तरदायी बनाया जाए। गोमती नदी के दोनों ओर 150 मीटर के अन्दर न कोई निर्माण किया जाए और न ही किसी प्रकार के प्लास्टिक, जैव तथा ठोस अपशिष्ट को एकत्रित किया जाए।

कमेटी ने कहा है कि सभी 11 जनपदों के जिला अधिकारी जल निगम व अन्य के माध्यम से अपनी डीपीआर नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत भेजें जो गोमती नदी में गिरने वाले नालों के सीवेज को उपचारित करने के बाद गोमती में डालने की व्यवस्था करें। भारत सरकार इन डीपीआर पर विचार करते हुए नौ माह के अन्दर कार्रवाई करे। इसके साथ ही नगर विकास, पर्यावरण तथा सिंचाई विभाग के सचिवों की एक कमेटी मनायी जाए जो एनजीटी के निर्देशों का एक निश्चित समय में क्रियान्वयन करे।

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