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    आगे अंधी गली है- प्रभाष जोशी (जन्मदिन विशेष)

    By July 15, 2017 Hot issue No Comments3 Mins Read
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    भाजपा को सच्ची राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिश करने वाले को या तो मधोक की तरह बाहर फेंक दिया गया या उसे आडवाणी की तरह शर्मसार होना पड़ा। संघ ने भाजपा को राजनीतिक पार्टी बनने के लिए तो बनाया नहीं है। उसे लोकतंत्र में हिंदुत्व का मुद्दा बनाये रखने के लिए एक मंच चाहिए जिस पर वह सदा अपना नियंत्रण रख सके।

    संघ ने भारतीय जनसे और भारतीय जनता पार्टी की लाइन को किस तरह नियंत्रित किया, इसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। लेकिन एक जो अब भी आपको याद होगा वह है लालकृष्ण आडवाणी का। दुनिया जानती है कि लालकृष्ण आडवाणी से ज़्यादा वफ़ादार शायद ही कोई स्वयंसेवक होगा। फिर भी जब वे पाकिस्तान गये और जिन्ना की मज़ार पर फूल चढ़ाने के बाद उनके एक भाषण के आधार पर सेकुलर बतानेलगे तो संघ इतना नाराज़ हुआ कि पार्टी में उनके ख़िलाफ़ विद्रोह करवा दिया और कुछ महीनों बाद अध्यक्ष पद छोड़ने को मजबूर कर दिया। संघ जिन्ना को कट्टर मुस्लिम सम्प्रदायी और भारत विभाजन का सबसे बड़ा अपराधी मानता है। मुसलमानों के वोटों के लिए लालकृष्ण आडवाणी जिन्ना के चाहे जिस अवतार का आविष्कार करें, संघ अपनी ऐतिहासिक दृष्टि और अपने निष्कर्ष बदल नहीं सकता। जिन्ना प्रकरण के बाद आडवाणी ने अपनी अध्यक्षता ही नहीं खोई, पार्टी में अपना रुतबा भी खो दिया। ऐसा कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बन जाने के बाद भी उन्हें संघ के पदाधिकारियों को अपने घर बुलाकर पार्टी के अपने साथियों को कहलवाना पड़ा कि जो ये कहें चुनाव में माना जाएगा।

    अटल बिहारी वाजपेयी तो जनसंघ भाजपा के सबसे लोकप्रिय, उदार और सर्वमान्य नेता माने जाते थे। लेकिन उनके समय में भी यह धारणा स्थिर और सिद्ध थी कि संघ की अनुमति के बिना कोई बड़ा काम नहीं हो सकता। वाजपेयी प्रधानमंत्री हुए और उनमें अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों और इनके मंत्रालयों की सूची राष्ट्रपति को भेजी। संघ ने जसवंत सिंह का मंत्रालय बदलवा दिया।

    इंदिरा, संजय, राजीव, सोनिया और राहुल अपने वंश की सत्ता पर टिके हुए भी कम से कम जनता के सामने गये और बार-बार अच्छी तरह चुनकर आये और इस तरह अपनी सत्ता की लोकतांत्रिक वैधता प्राप्त की। संघ का सरसंघचालक संघ में भी चुनानहीं जाता। स्वतंत्र चुनाव संघ में सम्मानीय और अनिवार्य प्रक्रिया नहीं माने जाते। गांधी-नेहरू परिवार की सत्ता अगर लोकतंत्र के नाम पर कलंक है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भाजपा पर नियंत्रण को आप क्या कहेंगे?

    मेरा निवेदन है कि लोकतंत्र के लिए यह वंशवाद से भी ज़्यादा ख़तरनाक है।

    ( पत्रकारिता के शिखर पुरुषों में से एक प्रभाष जोशी के एक महत्वपूर्ण लेख-आगे अंधी गली है-के संपादित अंश। यह लेख उन्होंने जून 2009 में लिखा था। उसी साल नवंबर में उनका देहांत हो गया। आज प्रभाष जोशी का जन्मदिन है। )

    वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से

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