शंका सिर्फ समस्या बढ़ाती है

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आत्मविश्वास बहुत बड़ी ताकत होती है. इसकी शक्ति की बदौलत व्यक्ति बड़े से बड़े तूफान को हंसते हुए झेल सकता है. दूसरी तरफ आत्मविश्वास में कमी एक ताकतवर व्यक्ति को भी निरीह बना देता है.

जानकार और विद्वान व्यक्ति को भी अज्ञानी बना देता है. आत्मविश्वास का सबसे बड़ा दुश्मन आशंका होती है. मेरे एक मित्र हैं. अच्छे पढ़े-लिखे हैं. अपना काम भी ठीक-ठाक जानते हैं. लेकिन, एक जगह टिक कर नौकरी नहीं करते हैं. जब भी उनके बॉस का तबादला होता है और कोई नया बॉस आता है, तो उन्हें लगता है कि नया आदमी उनकी नौकरी ले लेगा. इस आशंका की वजह से उनका काम प्रभावित होने लगता है. काम प्रभावित होने पर बॉस की एक छोटी डांट से भी उनका ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है और अपने सभी जानने वालों को नयी नौकरी तलाशने के लिए फोन लगाना शुरू कर देते हैं.

एक बार तो उन्होंने इतने लोगों को फोन कर दिया, मानों उन्हें नौकरी से हटा दिया गया हो. हर दो-तीन साल में उनके सामने ऐसी परिस्थिति आती है. समझाने पर कहते हैं, आप लोग कुछ समझते नहीं हैं. नया बॉस हमको पुराने बॉस का आदमी समझेगा. तंग करेगा. इसलिए हम पहले ही नौकरी खोजना शुरू कर देते हैं. जब उन्हें समझाया जाता है कि आप कंपनी के लिए काम करते हैं, बॉस के लिए नहीं, तो वह तर्क देते हैं- कोई भी नया बॉस ऐसा नहीं सोचता है. उसकी नजर में पुराने लोग पुराने बॉस के आदमी हैं.

लाख समझाने पर भी उनकी प्रवृत्ति बदलती नहीं है. इसका नुकसान भी उन्हें उठाना पड़ा है. जल्दी-जल्दी नौकरी बदलने की वजह से उनका वेतन भी उनके समकालीन मित्रों के बराबर नहीं पहुंच पाया है और प्रोन्नति भी रुकी हुई है. मेरे मित्र की कहानी बताती है कि आशंकाओं में कभी नहीं जीना चाहिए. आशंका सिर्फ शंका पैदा करती है और शंका सिर्फ समस्या बढ़ाती है, जिससे आपका आत्मविश्वास घटता जाता है.

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