एक राजा था। वह बड़ा अत्याचारी था। अपनी प्रजा को तरह-तरह से सताता था। उसके चारों ओर शत्रु पैदा हो गये। उसके दुव्यवहार से उसका लड़का भी विरोधी बन गया था। राजा बड़े संकट में पड़ गया। आदमी प्रेम के बीच सारा जीवन बिता देता है, किन्तु घृणा के बीच थोड़ी देर सांस लेना भी मुश्किल जाता है। जिस समय राजा बहुत दुःखी हो रहा था, उसके यहां एक साधु आये। राजा ने आंखों में आंस भरकर अपनी विपदा सुनाई और कहा, “महाराज, जैसे भी हो, मेरा संकट दूर कीजिये।”
साधु ने कहा, ‘राजन, तुम्हारी मुसीबत को दूर करने का एक ही रास्ता है और वह यह कि तुम राजपाट अपने लड़के को सौंपो और एकान्त में जाकर प्रभु के चरणों में लौ लगाओ।” मरता क्या न करता! राजा ने राजपाट अपने लड़के को सौंप दिया और जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगा।
एक दिन जब वह ध्यान में बैठा तो उसे याद आया कि कभी वह मुकुटधारी राजा था और सिंहासन पर बैठकर राज करता था। यह सोचते-सोचते वह ध्यान में लीन हो गया। तभी उस पर मन के भीतर के चोर ने आक्रमण किया। उसने देखा कि उस पर शत्रु प्रहार कर रहा है, पर उसके पास तो कुछ भी नहीं था। अब क्या करे? अचानक ध्यान आया कि सिर पर जो राजमुकुट है, उसी से दुश्मन का मुकाबला करना चाहिए। सिर पर हाथ गया तो चौंक उठा। न वहां मुकुट था, न वहां बाल थे। मुकुट को वह पहले ही छोड़ चुका था और बालों को संन्यासी होने से पहले मुड़वा चुका था! मार घबराहट के उसका ध्यान टूट गया।
देखता क्या है कि न वहां कोई शत्रु है, न कोई उस पर प्रहार कर रहा है। उसने आंखें मलीं। तभी देखा कि उसके सामने वही साधु खड़े हैं, जो राज राजमहल में आये थे। वह कह रहे थे, “आदमी का न कोई मित्र है, न कोई शत्रु है। आदमी स्वयं ही अपना शत्रु और अपना मित्र है। वह जब भटक जाता है तो उसे अपने चारों ओर दुश्मन-ही-दुश्मन दिखाई देते हैं। सोते-जागते उसे यही सपना आता रहता है कि दुश्मन उसको घेरकर उस पर वार कर रहा है।”
साधु के इन शब्दों ने उसके भीतर के कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र बना दिया। बाहर के शत्रुओं से लड़ने के बजाय वह अपने भीतर के दुश्मनों से लड़ने लगा। भावों की निर्मल धारा अब निचाई से ऊंचाई की ओर बढ़ने लगी। प्रकाशों से उनका अंतर जगमगा उठा। वह शान्ति से रहने लगे।







