- प्रदेश के लगभग 50 लाख ग्रामीण अनमीटर्ड घरेलू विद्युत उपभोक्ताओं से अधिक वसूल की गयी लगभग 955 करोड़ इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी को पावर कार्पोरेशन द्वारा वापस न करने पर मामला फिर गरमाया।
- उपभोक्ता परिषद ने प्रदेश के मुख्यमंत्री जी से हस्तक्षेप की उठायी मांग, कहा 50 लाख ग्रामीण अनमीटर्ड विद्युत उपभोक्ताओं को दिलायें न्याय।
लखनऊ, 21 जनवरी। प्रदेश के लगभग 50 लाख ग्रामीण अनमीटर्ड घरेलू विद्युत उपभोक्ताओं से गलत तरीके से 5 वर्षों तक वसूली गयी 20 प्रतिशत इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी का आदेश भले ही पावर कार्पोरेशन ने उपभोक्ता परिषद के विरोध के बाद अपनी गलती मानकर आज से 15 दिन पूर्व उसमें सुधार कर 5 प्रतिशत वसूलने का आदेश 3 जनवरी से आगे लागू कर दिया है, लेकिन ग्रामीण विद्युत उपभोक्ताओं से पूर्व में वसूल की गयी लगभग 955 करोड़ की ब्याज सहित वापसी पर आज भी पावर कार्पोरेशन चुपचाप बैठा है।
विगत सप्ताह ऊर्जामंत्री श्रीकान्त शर्मा से उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष की 2 पक्षीय वार्ता के बाद ऊर्जामंत्री जी द्वारा यह कहा गया था कि लाखों ग्रामीण विद्युत उपभोक्ताओं से पूर्व में अधिक वसूल की गयी धनराशि लगभग 955 करोड़ उपभोक्ताओं को वापस कराया जायेगा और गलत आदेश लागू कराने वाले उच्चाधिकारियों के खिलाफ कठोर कदम उठाया जायेगा। फिर भी पावर कार्पोरेशन मूक दर्शक बना है।
उप्र विद्युत नियामक आयोग द्वारा 4 जनवरी को एक सप्ताह में उपभोक्ताओं से अधिक वसूल की गयी इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी पर 7 दिन में रिर्पोट मांगी गयी थी, इसके बावजूद भी पावर कार्पोरेशन ने आयोग को अभी तक कोई जवाब नहीं भेजा। ऊर्जामंत्री व आयोग आदेशों की अवहेलना पर उपभोक्ता परिषद ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से पूरे मामले पर हस्तक्षेप करते हुए सपा सरकार से लेकर वर्तमान तक अधिक वसूल की गयी लगभग 955 करोड़ इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी को उपभोक्ताओं को वापस कराने की मांग की गयी है।
उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि कितनी बड़ी विडम्बना है कि पहले पावर कार्पोरेशन ने अर्थ का अनर्थ लगाकर उप्र मंत्रिमण्डल व विधान सभा से पारित अधिसूचना के विपरीत प्रदेश के लाखों विद्युत उपभोक्ताओं से 5 वर्ष तक अधिक वसूली की और जब उपभोक्ता परिषद ने इसका बड़ा खुलासा कर दिया तो अब पावर कार्पोरेशन प्रबन्धन मामले को लटकाने के लिये प्रमुख सचिव ऊर्जा को एक पत्र भेजकर यह अनुरोध किया है कि इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी आदेश की व्याख्या करने का अधिकार राज्य सरकार का है, इसलिये सरकार इस पर अपना अभिमत दे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार द्वारा वर्ष 2012 में पारित अधिसूचना पूरी तरह स्पष्ट थी कि ग्रामीण अनमीटर्ड घरेलू विद्युत उपभोक्ताओं से केवल 5 प्रतिशत ही वसूला जायेगा फिर पावर कार्पोरेशन ने गलत तरीके से 20 प्रतिशत क्यों वसूला? अब जब वापस करने का मामला आया तो पावर कार्पोरेशन उल्टे सरकार से अभिमत मांग रहा है। सबसे बड़ा चौकाने वाला मामला यह है कि पावर कार्पोरेशन के मुखिया व प्रमुख सचिव ऊर्जा स्वयं एक ही हैं। ऐसे में क्या उनका पावर कार्पोरेशन में लिया गया निर्णय और उन्हीं द्वारा फिर प्रमुख सचिव स्तर पर लिया गया निर्णय भिन्न हो जायेगा?
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने कहा कि पूर्व में वर्ष 2012 से गलत तरीके से अधिसूचना का अर्थ का अनर्थ लगाकर जिन भी उच्चाधिकारियों ने 5 वर्षों तक ग्रामीण विद्युत उपभोक्ताओं का शोषण किया। उसके लिये जितना वह दोषी हैं, उससे ज्यादा वर्तमान प्रबन्धन दोषी बन रहा है जो पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिये मामले को उलझा रहा है। जो पूरी तरह प्रदेश के लगभग 50 लाख ग्रामीण विद्युत उपभोक्ताओं का बड़ा अपमान है।







