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    Home»इतिहास के आईने से

    रहीम अली: ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मर्री जनजाति का अडिग योद्धा

    ShagunBy ShagunJanuary 28, 2026 इतिहास के आईने से No Comments3 Mins Read
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    इतिहास के पन्नों में कई ऐसी कहानियां दबी पड़ी हैं, जो हमें गर्व और प्रेरणा देती हैं
    फकीर काला खान और जलांब खान के साथ गुरिल्ला युद्ध लड़ा, 1891 में कैद होकर फांसी पर चढ़े – बालोचिस्तान की एक भूली-बिसरी बहादुरी की गाथा

    19वीं सदी के अंत में, जब ब्रिटिश साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के हर कोने पर अपना कब्जा मजबूत कर रहा था, बालोचिस्तान के पहाड़ी इलाकों में एक छोटी लेकिन दमदार आवाज गूंज रही थी। मर्री जनजाति के तीन बहादुर योद्धा जिसमें फकीर काला खान (जिन्हें ‘मस्त फकीर’ भी कहा जाता था), जलांब खान और रहीम अली ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत की। ये तीनों बालोच योद्धा थे, जिन्होंने अपनी जनजाति की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए ब्रिटिश सेनाओं से सीधे टकराव मोल लिया।

    विद्रोह की शुरुआत और गुरिल्ला संघर्ष

    मर्री जनजाति बालोचिस्तान के कोहलू और सिबी इलाकों में बसी थी, जहां ब्रिटिश सेनाएं रेलवे लाइनों, स्टेशनों और व्यापारिक चौकियों पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रही थीं। 1880-90 के दशक में ब्रिटिशों ने स्थानीय जनजातियों पर कर थोपे, सैन्य अभियान चलाए और दमनकारी नीतियां अपनाईं। रहीम अली और उनके साथियों ने इसका विरोध किया। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई – पहाड़ों की गुफाओं और घाटियों का फायदा उठाकर ब्रिटिश चौकियों पर अचानक हमले, आपूर्ति लाइनों को काटना और स्थानीय लोगों को संगठित करना।

    एक खास घटना में, इन योद्धाओं ने सुनारी रेलवे स्टेशन पर हमला किया, जहां ब्रिटिश प्लेटलेयर सहित कई लोग मारे गए। यह हमला ब्रिटिशों के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि मर्री योद्धा इलाके की भौगोलिक चुनौतियों से अच्छी तरह वाकिफ थे और लंबे समय तक छिपकर लड़ते रहे। चार साल तक यह संघर्ष चला, जिसमें ब्रिटिश सेनाओं को भारी नुकसान हुआ, लेकिन मर्री योद्धाओं का हौसला कभी नहीं टूटा।

    गिरफ्तारी, कैद और अमानवीय यातनाएं

    1891 में ब्रिटिश सेनाओं ने एक बड़े अभियान में इन तीनों को पकड़ लिया। कैद के दौरान रहीम अली को कठोर पूछताछ और यातनाओं का सामना करना पड़ा। लोहे की जंजीरों में बांधा गया, मारपीट की गई और अलग-थलग रखा गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें फोटो भी खिंचवाई, जहां वे जंजीरों में कैद दिखते हैं। जेल में भी वे साथी कैदियों को प्रेरित करते रहे, लेकिन ब्रिटिश अदालत ने उन्हें राजद्रोह और हत्या के आरोप में दोषी ठहराया।

    फांसी का दिन: अमर बलिदान

    1891 में ही (कुछ स्रोतों में 1896 तक का जिक्र मिलता है, लेकिन मुख्य घटना 1891 की है) ब्रिटिशों ने रहीम अली, फकीर काला खान और जलांब खान को सिबी में फांसी दे दी। फांसी से पहले वे सिर ऊंचा रखकर खड़े रहे। उनकी मौत ब्रिटिश दमन की क्रूरता का प्रतीक बनी, लेकिन साथ ही बालोच स्वतंत्रता की भावना को और मजबूत किया। उनके शवों को जला दिया गया, ताकि कोई समाधि या प्रतीक न बचे।

    विरासत का एक अनसुना नायक

    रहीम अली की कहानी आज भी बालोचिस्तान के लोकगीतों और मौखिक इतिहास में जीवित है। वे उन अनगिनत मुस्लिम क्रांतिकारियों में से एक हैं, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे पहले और सबसे ज्यादा बलिदान दिए। उनकी बहादुरी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई बड़े नामों की नहीं, बल्कि ऐसे योद्धाओं की होती है जो नाम से ज्यादा अपने कर्मों से अमर हो जाते हैं।

    यह गाथा हमें सिखाती है कि इतिहास के पन्नों में कई ऐसी कहानियां दबी पड़ी हैं, जो हमें गर्व और प्रेरणा देती हैं। – प्रस्तुति : नीतू सिंह 

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