सुप्रीम कोर्ट ने राफेल फैसले पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की टिप्पणी ‘चौकीदार चोर है’ को लेकर मंगलवार को उन्हें आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी किया गया। राहुल की इन टिप्पणियों के बारे में शीर्ष अदालत ने कहा था कि इसे गलत तरीके से उसके हवाले से बताया गया है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल विमान सौदे में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हवाले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जो टिप्पणी की थी, वह उन पर भारी पड़ सकती है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए राहुल गांधी को नोटिस जारी कर दिया है। इसका आशय है कि अदालत इस मामले की सुनवाई मुख्य रिव्यू पिटिशन के साथ करेगी।
गौरतलब है कि राफेल विमान सौदे में रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई का फैसला सुप्रीम कोर्ट पहले ही कर चुका है। ऐसे में राहुल की राजनीतिक परेशानियां बढ़ सकती हैं। दरअसल, रिव्यू पिटिशन पर शीर्ष अदालत के सुनवाई करने के फैसले मात्र से उत्साहित होकर राहुल मान बैठे थे कि शीर्ष अदालत भी मान गई है कि चौकीदार चोर है, जबकि अदालत के फैसले में ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया था। इस मामले में भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने अदालत में राहुल के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की थी। इस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने पंद्रह अप्रैल को राहुल को निर्देश दिया था कि 22 अप्रैल तक स्पष्टीकरण दें।
राहुल ने बीते सोमवार को अदालत की अवमानना के डर से अपने उस बयान पर खेद प्रकट किया जिसमें उन्होंने कहा था कि अब शीर्ष अदालत भी मानती है कि चौकीदार चोर है। राहुल ने अपने हलफनामे में कहा कि चुनाव प्रचार के जोश और उल्लास में वह इस तरह की टिप्पणी कर बैठे। कोई अवमानना करना उनका इरादा नहीं था।
दरअसल, भारतीय समाज और राजनीति में पैसा और पावर की चमक दिनोंदिन बढ़ती गई है, और राजनीतिक सत्ता से ही ये दोनों चीजें प्राप्त की जा सकती हैं। यही वजह है कि भारतीय समाज का हर रसूखदार व्यक्ति राजनीतिक सत्ता की कुर्सी हासिल करना चाहता है। इसके लिए चुनावोें में सभी राजनीतिक दलों के नेता हर तरह के हथकंडे आजमा रहे हैं। कहते हैं कि एक झूठ को सौ बार दोहराने से वह सच में तब्दील हो जाता है। यह नुस्खा भारतीय चुनावी राजनीति की धुरी बन गई है वरना जिस राजनीतिक दल ने साठ सालों तक देश में शासन किया हो उसके शीर्ष नेता अदालती कार्यवाहियों को समझ न सकें, भला इस पर कैसे विास किया जा सकता है।
सर्वाधिक चिंता की बात तो यह है कि जिनके कंधों पर लोकतंत्र को मजबूत करने की जिम्मेदारी है, वही लोग इसे कमजोर करने पर आमादा हैं। राजनीति का गिरता हुआ स्तर कहां तक जाएगा, यकीनन यह कहना बहुत मुश्किल है।







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