साहित्य जगत के गौरव कवि रमाशंकर मिश्र जी

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 बाँदा के केदारनाथ अग्रवाल जी के बाद एक महाकवि जिनके महाकाव्यों पर एमपी और बुंदेलखंड के विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी शोध करते हैं। यहाँ के शोधार्थियों के पसंदीदा विषय इन्हीं के महाकाव्य हैं। इतने महान कवि जो सिद्धांतों में भी अटल रहे, उन्हें पदक की लालसा नहीं, शायद इसी वजह से सदैव राजनीति या नेताओं से दूरियां बनी रही। साहित्य की सेवा ही उनका लक्ष्य था। आज वृद्धावस्था के चलते वो मौन में हैं, सैय्या में हैं। जिंदगी और मौत के बीच जंग छिड़ी है। इस जंग में भी उनकी साहित्य साधना जरूर झलक जाती है। शायद यह सोचते हुए कि उनकी निःस्वार्थ साहित्य साधना समाज के लिये प्रेरणा का स्रोत जरूर बनेगी।

राहुल कुमार गुप्त

रात्रिचरों के अनुकूल धुन्ध अंधेरी रात,
अरुणोदय तो कल्पना मात्र,
पर दिनचरों में मनुष्यों को देखो,
अपनी आदत बदल (उजाले में रहने) झेल रहे घुप्प अंधेरी रात,
साहस की कमी या दीपक जला उजाला करने का हौसला नहीं,
अपने जमीर को मार येन-केन प्रकारेण जिए जा रहे हैं
जैसे कीड़ों की हो ये जात,
ये है आमजनमानस की बात।
बिल्कुल आज के सामाजिक परिवेश की तरह,
कुछ अपना जमीर व ईमान जिन्दा रखते हैं और इन्सान बनें रहते हैं,
किन्तु प्रयासहीन व्यक्ति रात्रिचर ही बन जाते हैं।

कुछ विरले ही होते हैं जो महान होते हैं, लोगों में दीपक जलानें, समाज में उजाला लानें के प्रेरणास्रोत होते हैं व उनमें ऐसा करनें की प्रेरणा भरते हैं। इन्हें महान साहित्यकार व समाजसेवी की श्रेणी में रखा जाता है। समाज सुधारक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, साधु-संत व शिक्षक इसी श्रेणी के अंग हैं। यह सब गुण किसी एक में हो तो वो व्यक्ति कितना महान होगा, उसकी जन्मभूमि व कर्मभूमि इस महान व्यक्तित्व के धनी को पाकर अपने आपको पुनः सतयुग, त्रेता, द्वापर के युग का एहसास अवश्य कर रही होगी। कलयुग में कलयुगी प्रभाव के साथ एक तरफ से पुण्य का एहसास भी अवश्य कर रही होगी। ऐसे महान व्यक्ति की कर्मभूमि ऐतिहासिक, पौराणिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व लगभग हर क्षेत्र में पिछड़ी हुई है।

फिर भी इस बाँदा जनपद के बबेरू क्षेत्र की जमीं ने केदारनाथ अग्रवाल जी के बाद विश्व हिन्दी जगत को एक नहीं अपितु दो सूर्य प्रदान किये हैं, जिनके तेज से विश्व हिन्दी जगत कई सदियों तक तेजमान रहेगा और बाँदा जनपद का नाम इन साहित्य के विद्वानों के नाम से सदियों तक जाना जायेगा। भले ही इन तारों (सूर्यों) की पुष्टि अभी विश्व हिन्दी जगत के वैज्ञानिक न कर पाए हों किन्तु इनके वैद्वानिक व साहित्यिक तेज की परख के लिये वैज्ञानिकों के यंत्रों(राजनीतिक सिपारिस) की जरूरत नहीं है। मन व आँखें ही इसके लिए पर्याप्त हैं। हर तरह से पिछड़े क्षेत्र को अपनी रचनाओं व भावों द्वारा ऊर्जा प्रदान करने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। आज नहीं तो कल इस क्षेत्र की भारत में अहमियत जरूर होगी।

ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी महाकवि श्री रमाशंकर मिश्र जी व लक्ष्मी प्रसाद गुप्त जी हैं। दोनों ही इस पिछड़े क्षेत्र की दार्शनिक, वैचारिक, वैद्वानिक व साहित्यिक आँखें हैं, जो इस क्षेत्र को विश्व हिन्दी जगत में स्थान दिलानें के लिए रास्ता दिखा रही हैं। मिश्र जी के व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में जितनी उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं उनका आख्यान मेरे साथ-साथ इस क्षेत्र की जनता व विश्व के हिन्दी साहित्य के प्रेमियों को भी विदित होना चाहिये। मिश्र जी ने सन् 2005 तक आठ महाकाव्य, चार खण्डकाव्य, छः काव्य संग्रहों की रचना करके हिन्दी जगत में एक बड़े अभाव की पूर्ति की है। ढलती उम्र के साथ जिनका तेज और निखरता गया वो अपने आप में बेमिसाल प्रतिभा के धनी हैं। सन् 2005 के बाद भी कई रचनाएं हिन्दी जगत को प्रदान कर रहे हैं। पर मुझे केवल 2006 तक की रचनाओं की जानकारी होने का सौभाग्य प्राप्त है, और सोचता हूँ जल्द ही कुछ दिनों का अवकाश लेकर उन महान विभूति से आशीर्वाद का अवसर प्राप्त करूं।

गम्भीर स्वभाव के मिश्र जी के महाकाव्य भी गम्भीर प्रवृत्ति के नायक-नायिकाओं का चित्रण करते हैं। यथा स्वामी विवेकानन्द, भीष्म पितामह, लवकुश, साध्वी द्रौपदी, महासती अनुसुइया आदि। कई महाकाव्य, खण्डकाव्य, काव्य संग्रह कोई सधारण घटना नहीं है। कई महाकवियों ने एक विशेष क्षेत्र में ही महाकाव्य की रचना की है। किन्तु श्री मिश्र जी ने साहित्य जगत के हर क्षेत्र की ऊँचाइयों को छुआ है। इनके समकालीन प्रतिष्ठित कवि डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त, जवाहर लाल जलज, विष्णुदेव मिश्र, बाबू राजाराम श्रीवास्तव, जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव, प्रसिद्ध कहानीकार शिशुपालजी, युवा कवि श्री राजेन्द्र दीक्षित व राहुल कुमार गुप्त आदि कई कवि व साहित्यकार भी इनकी प्रशंसा करते नहीं अघाते।

कविवर मिश्रजी का व्यक्तित्व भी उनके कृतित्व सा महान व आदर्शों से भरा है। सादा जीवन-उच्च विचार, काँटों में भी मुस्कारते रहना मिश्र जी के जीवन का अभिन्न अंग है। धोती-कुर्ता व सदरी उनके प्रिय परिधान हैं। यहाँ उनका भारतीय वेशभूषा के प्रति अनन्य प्रेम दिखाई पड़ता है। व्यवस्थित जीवन चर्या, मधुर वचन व सत्य-भाषण करना उनका स्वाभाविक गुण है। इनके व्यक्तित्व व साहित्य में अद्भुत साम्य है। उनके व्यक्तित्व को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानों काव्य की व्यापकता सिमटकर मूर्त हो गयी हो।
मिश्रजी का व्यक्तित्व व कृतित्व सागर सा है जिसे एक छोटे से पात्र में नहीं भरा जा सकता अतः उनके यथार्थ का वर्णन करने में कहीं न कहीं कमी जरूर बनी रहेगी।
श्री मिश्र जी के साहित्य पर सीमा सिंह पं. जे. एन. डिग्री कालेज बाँदा से एम.ए. पर लघु शोध कर चुकी हैं तथा सागर विश्वविद्यालय म.प्र. में राजेश पाठक डा. सरोज गुप्ता के निर्देशन में पी.एच.डी. कर चुके हैं, जिसका विषय “ कवि रमाशंकर मिश्र की रचनाओं का समीक्षात्मक अनुशीलन है।” आदर्शों के पर्याय श्री रमाशंकर मिश्र जी के आदर्श रामराज्य की परिकल्पना को साकार करते आये हैं। उनके इन्हीं आदर्शों और विद्वता के कारण क्षेत्र की जनता के लिये वो पूजनीय और अतुलनीय हैं।
पौराणिक, आध्यात्मिक व साहित्यिक संगम के स्थान प्रयाग की पावन भूमि(दारागंज) में “मिश्र जी” ने संवत 1991, 14 भाद्र कृष्ण पक्ष में जन्म लेकर इस संवत के साथ-साथ अपनी जन्मभूमि व कर्मभूमि को भी पावन किया है। इनकी मुख्य कर्मभूमि बाँदा जनपद की बबेरू तहसील ही है जहाँ इन्होंने कई हिन्दी जगत की कई विधाओं में बेहतरीन रचना कर उन्हें ऊँचाइयाँ प्रदान की है।

और यहीं इनका परिवार बसा, पला और बढ़ा। इनके पूर्वज रायबरेली के तिवारीपुर गांव से थे। इनके पिता श्री रामकृष्ण मिश्र जी बाँदा जनपद की बबेरू तहसील के अन्तर्गत आने वाले समगरा गाँव के निवासी थे। समगरा गाँव यमुना नदी के तट पर बसा हुआ है। इसी कारण कुछ न कुछ यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध हो जाता है।
ज्योतिषि, व्याकरण, संस्कृत, आयुर्वेद के विद्वान पिता की संतान स्वाभाविक रूप से विद्वान होना ही चाहिए। माँ श्रीमती सुन्दरदेवी की धार्मिक और गम्भीर प्रवृत्ति की छाप भी श्री मिश्र जी को प्राप्त हुई।
अपने माता-पित की ज्येष्ठ संतान होनें से दुलार पाकर भी अच्छी प्रवृत्तियों में अग्रसर रहे न कि आज के सामाजिक परिवेश की तरह। संस्कृत के पारिवारिक परिवेश में धार्मिक वातावरण होने का प्रभाव कवि के बाह्य व अंतरंग दोनों पक्षों में नितान्त रूप से हुआ है।

मिश्र जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। हिन्दी, संस्कृत व अंग्रेजी भाषाओं में इनकी अच्छी पकड़ है। चित्रकूट इण्टर कॉलेज, कर्वी में इनकी इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा सम्पन्न हुयी।

अपने छात्र जीवन से ही हिन्दी और अंग्रेजी में कवितायें लिखने लगे थे। ये कवितायें इनकी अन्तर्यात्रा नामक काव्य संग्रह में संग्रहित है। हर प्रसिद्ध कवि व साहित्यकार की तरह इनको भी अर्थ सम्बन्धी समस्यायें रहीं जो इनकी इस कविता से प्रदर्शित होता है –

होता यदि कोटि पति का सुपुत्र
जीवन में खिलते नव शत दल
शिक्षा-दीक्षा होती विचित्र
मादक सुरभित होती विचित्र”

      (सरस स्वर में संग्रहित)।

किन्तु काँटों में मुस्कारते रहनें वाले इनके आदर्श विचार के कारण सदा विकास के पथ पर अग्रसर होते रहे। तुलसीदास जी के चौपाई यहां चरित्रार्थ हो रही है– जहाँ सुमति तहं सम्पत्ति नाना…। छात्र जीवन से निकलकर श्री जे.पी.शर्मा इंटर कालेज में एक प्रतिष्ठित शिक्षक बन कर अपना सफर शुरू किया तथा प्रधानाचार्य पद को भी सुशोभित किया। इनके तीनों पुत्र(ज्येष्ठ पुत्र मनोज मिश्रा, नीरज मिश्रा व जलज मिश्रा) प्रतिष्ठित सरकारी नौकरियों में ईमानदारी से कार्यरत हैं व तीनों पुत्रियाँ सफल ग्रहणी की आधारशिला हैं।
श्री मिश्र जी की धर्मपत्नी शैल कुमारी साहसी, प्रबुद्धा, धर्मशीला एवं बड़ी प्रगतिशील विचारों वाली पारिवारिक महिला हैं।

अविराम निरन्तर उद्देश्य पूर्ण गतिशीलता जो अवरोधों पर रुके नहीं, चट्टानों पर झुके नहीं और तुफानों में मुड़े नहीं। यदि वह जड़ में आ जाए तो उसका भी व्यक्तित्व बन जाता है। इस प्रकार मिश्र जी जीवन भर गंगा की तरह संघर्ष करते आये हैं। अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए उस गंगा की भाँति जिसके अन्तरण में उसकी पावन जलधारा में उसके प्रवाह और नाद में करुणा प्रेरित कोमल जनकल्याण की भावना भरी हूई रहती है पर उसका रूप स्वरूप और वेग बहाव एक नितान्त निर्मम और निष्ठुर गन्तव्यशील पथिक के रूप में बढ़ता दिखाई देता है। उद्देश्य की इसी पवित्रता से पूर्ण मिश्र जी का व्यक्तित्व साहित्य की सहज शीलता की धार बन गया है। जिसनें अपने प्रवाह मान जीवन से न केवल साहित्य को समृद्ध किया अपितु अनेक अभावग्रस्त जीवनों को आत्मसंतोष भी प्रदान किया।

स्वाभिमान ही उनका भूषण हैं और अनुशासन उनका सदाचरण। इन्हीं अर्थों में वे एक आदर्श व्यक्ति हैं। मिश्र जी की रचनाएं संसार गीत व स्फुट कविताओं से प्रारम्भ होकर, महाकाव्य और कई विधाओं की अग्रसर होती हैं। साहित्यिक संस्कार तो उन्हें अपने पैतृक परिवेश से मिले थे किन्तु शिक्षा-दीक्षा तथा उनकी अध्ययन अभिरुचि ने उन्हें लेखन के गम्भीर दायित्व से जोड़ दिया। भावुक और किशोर कवि ह्रदय में पूर्व के बीज संस्कार के रूप में विद्यमान थे। यह प्रतिभा अवसर पाकर अंकुरित और विकसित हुई। कवि ने अपनी कविताओं से अपनी अन्तर्यात्रा प्रारम्भ की। प्रयोगवादी हिन्दी आन्दोलनों तथा अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव के कारण उन्होंने प्रयोगवादी कविताएं भी लिखीं। किन्तु कवि की मूल आत्मा भारतीय जीवन मूल्यों पर ही आधारित रही। उन्होंने हिन्दी में कई महाकाव्यों व खण्डकाव्यों की रचना की। मिश्र जी की र चनाएं अपने आप में बहुत ही प्रभावशाली हैं। इन्होंने काव्य के अलग-अलग क्षेत्रों को बड़ी सरलता से प्रस्तुत किया।

1- स्फुट कवितायें- अन्तर्यात्रा,, 2- गीतकाव्य- सरस्वर,, 3– प्रयोगवादी कविताएं– प्रयोगवादी आयाम,, 4-– खण्डकाव्य– सुलोचना का सतीत्व, राजर्षि मान्धाता, महादेवी राज्य श्री डॉ. एनीबेसेन्ट,,,
5- महाकाव्य— स्वामी विवेकानन्द, भीष्म पितामह, लवकुश, साध्वी द्रौपदी, महासती अनुसुइया, महानारी मदालसा, भगिनी निवेदिता, अजात शत्रु युधिष्ठिर आदि।

कई प्रसिद्ध कवि किसी विशेष क्षेत्र में ही अपने सृजन का प्रयोग करते रहे। किन्तु महाकवि श्री रमाशंकर मिश्र जी ने मानों काव्य को अपने वश में किया हो। काव्य के हर क्षेत्र को प्रभावित करने वाले मिश्र जी ने भारतीय परिवेश को अपने काव्य में जितनी वरीयता दी है उससे स्पष्ट है कि मिश्र जी के मानस पटल पर देश व भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम है।