सैटेलाइट से भूगर्भ वैज्ञानिकों, आर्कियोलाजिस्ट की टीम ने प्राप्त चित्रों और सेतु स्थल के पत्थरों और बालू का अध्ययन करने के बाद यह पाया है कि भारत और श्रीलंका के बीच एक सेतु का निर्माण किए जाने के संकेत मिलते हैं
नई दिल्ली, 14 दिसम्बर। देश के लोग भले ही रामसेतु की ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता को संकीर्ण राजनीतिक कारणों से खारिज करते रहते हैं और उसे काल्पनिक बताते हैं। लेकिन सैटेलाइट से भूगर्भ वैज्ञानिकों, आर्कियोलाजिस्ट की टीम ने प्राप्त चित्रों और सेतु स्थल के पत्थरों और बालू का अध्ययन करने के बाद यह पाया है कि भारत और श्रीलंका के बीच एक सेतु का निर्माण किए जाने के संकेत मिलते हैं।

वैज्ञानिक इसको एक सुपर ह्यूमन एचीवमेंट मान रहे हैं। भारत-श्रीलंका के बीच 30 मील के क्षेत्र में बालू की चट्टानें पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, लेकिन उन पर रखे गए पत्थर कहीं और से लाए गए प्रतीत होते हैं। यह करीब 7 हजार वर्ष पुरानी हैं जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब 4-5 हजार वर्ष पुराने हैं। गौरतलब है कि भारत के दक्षिणपूर्व में रामेश्वरम और श्रीलंका के पूर्वोत्तर में मन्नार द्वीप के बीच उथली चट्टानों की एक चेन है। इस इलाके में समुद्र बेहद उथला है। समुद्र में इन चट्टानों की गहराई सिर्फ़ 3 फुट से लेकर 30 फुट के बीच है। इसे भारत में रामसेतु व दुनिया में एडम्स ब्रिज के नाम से जाना जाता है।
इस पुल की लंबाई लगभग 48 किमी है। रामसेतु भौतिक रूप में उत्तर में बंगाल की खाड़ी को दक्षिण में शांत और स्वच्छ पानी वाली मन्नार की खाड़ी से अलग करता है, जो धार्मिक एवं मानसिक रूप से दक्षिण भारत को उत्तर भारत से जोड़ता है। रामसेतू पुल भारत के दक्षिण-पूर्वी तट के किनारे तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम द्वीप और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट मन्नार द्वीप के बीच स्थित है। जियोलॉजिस्ट डॉक्टर एलेन लेस्टर बताते हैं कि हिंदू मान्यता के मुताबिक इस पुल को भगवान राम ने बनवाया था। साइंस चैनल ने व्हाट ‘ऑन अर्थ एनसिएंट लैंड एंड ब्रिज’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है। जिसमें भू-वैज्ञानिकों की तरफ से यह विश्लेषण इस ढांचे के बारे में किया है। वैज्ञानिकों के विश्लेषण के बाद पत्थर के बारे में रहस्य और गहरा गया है कि आखिर ये पत्थर यहां पर कैसे पहुंचा और कौन लेकर आया है।








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