क्यों तुम शमांए जला रहे हो,
जला के फोटो खिचा रहे हो।
बुझे हैं सैकड़ों घरों के दीपक,
अंधेरों में रौशनी चुभा रहे हो।
तुम अपने रहबर की चाल समझो,
शमा तो वो भी जला रहे हैं।
क्षमा के लायक नहीं वो हरगिज,
अमन शमा से जला रहे हैं।
हिफाजतों की शमा वो ऐसे बुझा रहे हैं,
शमा से घर वो जला रहे हैं, फिर खुद शमा को बुझा रहे हैं।
शमा को पहले हुकुम दिया था,
उसे जलाओ, इसे मिटाओ,
फिर मिटने वालों की साजिशों का शिकार होकर स्याह अंधेरों सी नफरतों का शिकार हो जाओ।
शमांए नफरत की खुब जलायीं,
शमा की लौ से शमा जलायी,
इधर भी लाशें-उधर भी लाशें।
छिपी भी लाशें, दिखीं भी लाशें,
उन्हीं में चंद मनपसंद सी लाशें
सियासी बाजार में खुब मुनाफा कमा रहे हैं,
वो मौत और नफरतों की शम्मा शमा से ही जला रहे हैं,
और इन तरह से वो जिन्दगी की रोशनी को बुझा रहे हैं।
समझ ना पाये हैं साजिशों की असल हक़ीक़त,
इन मंजरों से हुए है विचलित और बदहवासी में अमन की शमा जला रहे हैं।
और कह रहे हैं कि युद्ध में भेजो, जो बच गये हैं उन्हें भी झोको,
कभी जंग की पैरवी में ज़ुबां से नफरत के बम चला रहे हैं।
समझ ना पाये हैं सच को अब तक,
बस उनकी मंशा को कामयाबी के रास्ते पर बढ़ा रहे हैं।
बुलंद हो गये हैं हौसले उनके,
भड़कते जज्बात से वो शातिर सियासी खिचड़ी पका रहे हैं।
चुनावी मौसम में वो शहादत दिला रहे हैं, भुना रहे हैं..
और हम तो हम हैं, महामूर्ख आमजन हैं,
जो सच है उसको भूले जा रहे हैं।
शहीदों के कातिलों के खंजरों को नफरतों की आग में धार देकर जवानों के सिर तनों से उड़ा रहे हैं,
हमारे जज्बात हमारे बस में कहां रहे हैं, अक्ल कहां, अब समझ कहा हैं।
कभी जंग पर जा रहे हैं, कभी अमन की शमा जला रहे हैं।
कोई मुस्कुरा कर ये कह रहा हैं कि नफरतों के इन्हीं मौसमों में चुनाव धीरे-धीरे नज़दीक आ रहे हैं….
– नवेद शिकोह








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