Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Thursday, October 22
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»ब्लॉग»Hot issue

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

    ShagunBy ShagunAugust 10, 2021 Hot issue No Comments13 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 3,563

    आशा शैली

    किसी भी राष्ट्र के सुदृढ़ ढाँचे, उस राष्ट्र के निर्माण और रख-रखाव में जितना हिस्सा पुरुष वर्ग का है उतना ही बल्कि उससे भी कहीं अधिक नारी वर्ग का होता है। प्रश्न उठ सकता है कि चलो बराबर तो हुआ परन्तु अधिक कैसे हो गया? तो इसे आप यूँ समझ सकते हैं कि चाहे नारी किसी क्षेत्र में सक्रिय न भी रहे तो भी पुरुष की सफलता के पीछे स्त्री हर समय उपस्थित अवश्य ही रहती है। पुरुष वर्ग भी समर्पित भाव से कहीं भी कार्य तभी कर सकता है जब वह अपने दायित्वों के प्रति निश्चिंत हो जाए, परन्तु बड़े-बड़े विद्वान भी इस सत्य से इनकार नहीं कर सकते कि किसी भी राष्ट्र के निर्माण में स्त्री की ही मुख्य भूमिका रहती है। पुरुष का नम्बर तो उसके बाद आता है।

    मनुष्य के जन्म से भी पूर्व नारी की भूमिका गर्भवती माँ के रूप में प्रारम्भ हो जाती है। फिर बालक का जन्म और लालन-पालन और उसकी शिक्षा। शिशु जो समाज का भावी कर्णधार होता है, माँ के अभाव में कई प्रकार की कुण्ठाओं का शिकार हो जाता है, जबकि एक नारी के हाथों पले-पनपे बालक स्वस्थ, सभ्य और सुसंस्ड्डत नागरिक बनते हैं। जिस बालक का लालन-पालन माँ के दुलार के अभाव में हुआ हो उस में कोमल भावनाओं का अभाव रहता है।

    वैसे तो आज के मशीनी युग में सारे समीकरण बदलते जा रहे हैं फिर भी जिस बच्चे को विदुषी माँ का संरक्षण प्राप्त होता है उसे उदारता और बुद्धिमत्ता की देन माँ से मिली होने के कारण उस बालक को सभ्य नागरिक होना ही होता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शिवाजी मरहटा की माता जीजाबाई का पालन-पोषण है। कहा यह जाता है कि विदेशी शासकों से देश को स्वतन्त्र कराने का प्रण जीजाबाई ने ही लिया था। अपने इसी प्रयोजन को सामने रखकर उसने बालकपन से ही शिवाजी को लक्ष्य निर्धारित शिक्षा से समृद्ध किया और मुगलों से टक्कर लेने के योग्य बनाया। सम्राट अकबर के लालन-पालन और शिक्षा में उसकी धाय माँ माहिम का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है।

    नारी के सहयोग का दूसरा चरण है शिक्षा। सृष्टि का सबसे बड़ा सत्य यही है कि बालक का पहला गुरू माँ होती है। बालक के होंठ हिलते ही माँ उसे बोलना सिखाती है। विद्वानों का कथन है कि मनुष्य वही बनता है जैसे उसके संस्कार होते हैं और संस्कार उसे अधिकतर घर से अर्थात् माँ से प्राप्त होते हैं। गृहस्वामिनी शिक्षित और सुसंस्ड्डत हुई तो वह अपने बच्चे को कभी बिगड़ने नहीं देगी। सुप्रसिद्ध लेखक और क्रान्तिकारी यशपाल यह मानते हैं कि उनको देशभक्ति की शिक्षा उनकी माँ ने ही दी थी।

    लालबहादुर शास्त्री की माता ने भी उन्हें अपने देश की रक्षा और सेवा की प्रेरणा दी थी। इससे यह सिद्ध होता है कि माँ अर्थात् नारी ही राष्ट्र के निर्माण और उत्थान में पहला पड़ाव होती है। वह देखती है कि उसका बच्चा किन लोगों के साथ उठ-बैठ रहा है। क्या कर रहा है और क्या नहीं। अतः नींव का पत्थर बनी नारी राष्ट्रनिर्माण में उसे सुदृढ़ आधार देती है।

    भारत को स्वतंत्रता प्राप्त किए हुए शताब्दी पूरी होने में कुछ ही वर्ष बाकी रह गए हैं। शताब्दियों तक परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े रहने और विदेशियों के अत्याचार सहने के बाद, हजारों नहीं लाखों बलिदानियों के बलिदान के बाद हमारा देश विदेशी आक्रान्ताओं के चंगुल से बाहर निकल पाया है। अन्तिम और निर्णायक लड़ाई में नेता जी सुभाष, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक उल्लाह जैसे हज़ारों देशभक्तों के बलिदान की भागीदारी के साथ इस आन्दोलन में भारत के हर नागरिक का बहुमूल्य योगदान रहा है।

    कुछ लोग यह भी कहते सुने जा सकते हैं कि हम पीछे पलट कर देखते रहते हैं परन्तु अपने गौरवमय अतीत को याद रखना हर देश के नागरिक का प्रथम कर्तव्य होता है। जो देश अपने गौरवमय अतीत को भुला देता है उसका पतन अवश्यम्भावी होता है। अतः हमें देश को स्वतंत्र कराने वाली विभूतियों के प्रति श्रद्धावनत होना ही चाहिए और उनके बलिदान के लिए उन्हें याद रखना और उनके पदचिन्हों पर चलना हमारा दायित्व बन जाता है। हमें हर समय सावधान रहकर देखना चाहिए कि कहीं हम अपनी स्वतंत्रता की नींव में रखी उस सुदृढ़ आधारशिलाओं को विस्मृत तो नहीं करते जा रहे हैं?

    अरबी की कहावत है कि लड़ाई के तीन कारण होते हैं, ‘जर, जोरू और ज़मीन।’ इन तीन ‘ज़’ में से ज़मीन अर्थात धरती (या देश भी कह सकते हैं) आदिकाल से ही युद्धों का कारण बनते रहे हैं। जब भी कोई देश परतन्त्र होता है अर्थात् मातृभूमि किसी विदेशी सत्ता के हाथ में चली जाती है तो शेष दोनों ‘ज’ (जर और जमीन जैसी बेजान सम्पदा के साथ जोरू अर्थात् स्त्री भी) अपने आप लड़ाई का हिस्सा बन जाते हैं। स्त्री, जिसके पास चेतना सहित दिल और दिमाग भी होता है, गुलामी की जंजीरें काटने के लिए पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर हुंकार कर उठती है और ऐसी हर हुंकार किसी भी आन्दोलन में नए प्राण फूंकने का काम करती है।

    शताब्दियों पूर्व मुस्लिम शासकों की गुलामी को स्वीकार न करके उनसे टक्कर लेने और बलिदान देने वाली वीरांगनाओं में राजपूताने के नारी वर्ग का ही नाम इतिहास में उजागर है, किन्तु अंग्रेज शासकों के अन्यायी शासन के विरोध में पूरे भारत का ही नारी वर्ग जाग उठा था। न सिर्फ जाग उठा बल्कि पूरे जोर-शोर से उनकी दहाड़ की गूँज ही थी जो अंग्रेजी शासन के सिंहासन को हिला देने वाली सिद्ध हुई।

    सब जानते हैं कि व्यापार करने आई चालाक अंग्रेज जाति जब अपने छल-बल से विखण्डित भारतीय शासकों की फूट का लाभ उठाते हुए स्वयं शासक बन बैठी तो उसकी लिप्सा ने उसे पूरे भारत को हड़पने के लिए उकसाया और कोई न कोई बहाना बनाकर छोटी-छोटी रियासतों को हड़पने का एक कार्यक्रम बना लिया। उस समय अंग्रेजी सत्ता के विरोध में उभरने वाला असंतोष का पहला नारी स्वर जो अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उभरा, वह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का था। लक्ष्मीबाई का नाम कोई अकेला नाम नहीं था, अपितु उसके साथ उसकी पूरी नारी सेना थी। इस संदर्भ में उनकी विशेष परामर्शदात्री झलकारी बाई का नाम बड़े गर्व से लिया जा सकता है। इनकी विशेष सहयोगी मोती बाई (नर्तकी) का नाम लिया जाता है, जिन महिला रत्नों ने अन्तिम साँस तक महारानी का साथ निभाया।

    झांसी से उठने वाला विदेशी सत्ता के विरुद्ध खुला विद्रोह ही स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम रूप-रेखा बना, जिसे प्रथम स्वर दिया एक नारी ने। निःसंदेह नारी की स्वतंत्रता संग्राम में यह उल्लेखनीय भूमिका रही है। स्वतंत्रता संग्राम में सन् 57 में चमकने वाली इस पुरानी तलवार के ताल पर बुंदेलखण्ड में गूँजता झांसी की रानी का यशगान ही उनकी अमर कथा कहता है। ओजस्वी कवियत्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों में-

    ‘‘चमक उठी सन् सत्तवन में, वह तलवार पुरानी थी
    खूब लड़ी मरदानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।
    बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
    खूब लड़ी मरदानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।’’

    इस पुरानी तलवार के पीछे जो फौज थी, उसके बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएँ तैनात थीं, जिन्होंने अंग्रेजों को छटी का दूध याद दिला दिया था। इसमें रानी के तोपखाने पर तैनात दो बहनों के नाम बड़े ही गर्व से लिए जाते हैं। झलकारी रानी की अंगरक्षक थी। रानी लक्ष्मीबाई के गम्भीर रूप से घायल होने पर उनका छत्र और मुकुट लगाकर झलकारी ने अंग्रेजों को तब तक भ्रम में रखा जब तक रानी की समाधि नहीं बन गई। अन्त में झलकारी के पति के वीरगति प्राप्त करने पर ही अंग्रेज सच्चाई को जान पाए, परन्तु वे उसे झुका नहीं सके। इतने लम्बे समय तक अंग्रेज फौजों से लड़ना कोई हँसी-ठट्ठे का काम नहीं था जिसे झलकारी बाई ने अन्तिम साँस तक बड़े दम-खम से निभाया और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुई।

    रानी की मृत्यु के साथ ही इस महायज्ञ की अग्नि मन्द तो अवश्य ही पड़ गई परन्तु बुझी नहीं और समय पाकर फिर भड़क उठी। अब तक तो अंग्रेजों ने भारत की अर्थ व्यवस्था नष्टप्रायः कर दी थी। पं. जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में ‘‘यह व्यवस्था भारत की किसी भी आवश्यकता की पूर्ति नहीं करती। यह न ही देश के काम की है और न ही आम जनता के हित में है।’’ नेहरू जी ने अपनी पुस्तक ‘वीमेंस ऑफ़ इण्डिया’ में लिखा है, ‘उनकी (अंग्रेज़ शासकों की) इच्छा थी कि वही नीति चलाई जाए जिससे भारतीयों को अधिक से अधिक दबाया जा सके और शासक वर्ग का हितसाधन हो।’ अंग्रेजों के इन कुचक्रों के बाद भी अत्यल्प मात्रा में ही सही परन्तु भारतीय नारी ने स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा से जुड़ने का प्रयास जारी रखा था।

    महात्मा गाँधी और सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेता स्वतंत्रता की मशाल लेकर इस महासंग्राम की रणभूमि में उतर चुके थे। इनका साथ देने के लिए चारों ओर से जन समुद्र उमड़ा पड़ रहा था, ऐसे में उनकी हुंकार में अपना स्वर मिलाने से भारतीय नारी भला कैसे पीछे रह सकती थी? इस हुंकार में जो पहला नारी-स्वर जुड़ा वह बम्बई के एक सम्पन्न पारसी घराने की चौबीस वर्षीय युवती ‘श्रीमती भीकाजी कामा’ का था। देश की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा लेने से इस सम्पन्न महिला को कोई भी सुख-सुविधा न रोक सकी। श्रीमती कामा अपने संकल्प को निभाने के लिए कांग्रेस से आ मिलीं। आगे चलकर इसी विदुषी वीरांगना ने भारत को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगा दिया। यह झण्डा भीकाजी कामा के मस्तिष्क की उपज के फलस्वरूप हमारे सामने आया है। अन्तर केवल इतना है कि भीकाजी कामा के बनाए झण्डे के मध्य में चरखा कातती महिला हुआ करती थी और आज हम वहाँ अशोक चिन्ह देखते हैं।

    पंडित जवाहरलाल नेहरू के अनुसार श्रीमती ऐनी बेसेंट एक विस्फोटक शक्ति के रूप में उभरीं। इस समय राष्ट्रीय जागरण दक्षिण की महिलाओं में भी काफ़ी जोर पकड़ चुका था। रामाबाई रानाडे, पं. रामाबाई, सरोजनी नायडू, लेडी बोस, पं. विजया लक्ष्मी, अरुणा आसिफ़ अली, अवंतिका बाई और कमला देवी आदि जाने कितने ऐसे नाम हैं जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में सुनहरे पृष्ठ जोड़े। इन साहसी महिलाओं और दबंग सेनानियों का सहयोग पुरुषों के बलिदानी साहस और मनोबल को सहस्रगुना बढ़ाने में अवश्य ही सक्षम रहा है इसमें कोई भी संदेह नहीं है।

    इस काल खण्ड में मलिओं की अग्रणी भूमिका रहने और आगे बढ़ कर काम करने के बाद भी इनका अपना अलग कोई संगठन तब तक नहीं बन पाया था। वे पुरुषों के साथ मिलकर काम कर रही थीं। किन्तु पर्याप्त मात्रा में महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के कारण अलग महिला दल की आवश्यकता को अनुभव करते हुए 1917 में श्रीमती कोसीन के नेतृत्व में प्रथम आधुनिक महिला संगठन अस्तित्व में आया। महिला संगठन के बनते ही इस ‘चुम्बकीय व्यक्तित्व’ के आकर्षण में हजारों की संख्या में साहसी महिलाएँ खिंची चली आईं।

    सन् 1919 में प्रथम महिला दल डॉ. सरोजनी नायडू के नेतृत्व में सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मोंटगू से मिला। अभी तक महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था, न ही वे राजनीति में भाग ले सकती थीं। डॉ. सरोजनी नायडू ने मोंटगू के सामने यह प्रस्ताव रखा कि व्यस्क मताधिकार के तहत महिलाओं को भी राजनीति में भाग लेने और वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इनकी इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया।

    सरोजनी नायडू अकेली ही तो नहीं थीं, भारत की सैकड़ों, हजारों ही नहीं अपितु लाखों महिलाएँ उनके साथ थीं, अतः ब्रिटिश सरकार को आखिर झुकना ही पड़ा। अधिकार देने के बाद भी चालाक शासक ने उसमें छिद्र रख ही लिया, क्योंकि यह अधिकार केवल करदाताओं को ही दिया गया। परिणाम स्वरूप जब चुनाव हुए तो बहुत कम महिलाएँ ही चुनी गईं। इस प्रकार इस तरह मात्र कुछ ही महिलाओं को उभरने का अवसर मिला।

    इतना सब होने के बाद भी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में महिलाओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। श्रीमती कामदार, अवंतिका बाई गोखले, कमलम्मा, सत्यवती, कृष्ण देवी पंजीकर, जयश्री राजा जी, हंसा महतो, पेरिन कप्तान, नीलावती मुंशी, मनीबेन, देव महत्रे बहनें और ऐसे ही अनगिनत नाम हैं जिन्होंने अपने बलिदान से देश के इतिहास का एक सुनहरा अध्याय लिखा है। मद्रास की सबमनी लक्ष्मीपति नमक सत्याग्रह में नेता रही हैं। स्वयं श्रीमती कस्तूरबा गाँधी का योगदान भी जीवन पर्यन्त रहा।

    भारत में भारतवासियों का शासन स्थापित कराने में हमें बहुत से विदेशियों का सहयोग भी प्राप्त था। वे सभी अंग्रेजों के कुशासन चक्र में पिसते हुएपीड़ित भारतीयों के प्रति संवेदनशील थे। यहाँ की गरीबी अशिक्षा और पारम्परिक रूढ़ियों को कारण मानकर इन राष्ट्रभक्त विदेशियों ने, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को त्वरा, प्रोत्साहन और सक्षमता प्रदान की। इसमें विदेशी मूल आयरलैण्ड की एक महिला स्वामी विवेकानन्द जी को मिलीं। स्वामी जी ने उनका ‘सिस्टर निवेदिता’, नया नामकरण किया। निवेदिता ने स्वामी जी से दीक्षा लेकर उनको अपना गुरु माना और भरतवासियों की हर प्रकार मदद की।

    दुर्गा भाभी का नाम कौन नहीं जानता। सरदार भगतसिंह को बचाने के लिए वे स्वयं अपनी और अपने पुत्र तक की जान पर खेलकर उन्हें सुरक्षित निकाल ले गईं और अन्तिम समय तक अपने पति की इच्छाओं का सम्मान करते हुए देश रक्षा और स्वतंत्रता के युद्ध में संलग्न रहीं। नेता जी सुभाष की आजाद हिन्द फौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल और अन्य महिलाएँ वाहिनी में अनी जान पर खेलती रहीं।

    हिमाचल प्रदेश के राजा भवानी सेन की तीसरी पत्नी रानी खैरागढ़ी क्रान्तिकारियों को भरपूर धन देकर उनकी सहायता करती रहीं और अपना बस चलते तक उन्होंने उन क्रान्तिकारी वीरों को सुरक्षा प्रदान की जिन्हें बाद में पकड़े जाने पर काले पानी भेज दिया गया।

    सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी लेखनी और अहिंसात्मक आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। महारानी जिन्दा ने अपना अन्तिम समय रंगून की जेल में ही गुजारा। भारात के विभिन्न भागों से इसके भी अतिक्ति चीन्हें-अनचीन्हें अनेक नारी रत्नों ने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेकर स्त्री जाति को गौरवान्वित किया है। अतः हम सगर्व कह सकते हैं कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर भारतीय नारी के इतिहास को गौरवान्वित और समृद्ध किया है।

    पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘वीमेंस ऑफ़ इण्डिया’ में लिखा है कि ‘स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।’ शिक्षित वर्ग तो एक ओर, हज़ारों, लाखों अनपढ़, अशिक्षित और अपरिपक्व नारियों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत होकर अदम्य साहस और विलक्षण सूझ-बूझ का परिचय दिया है।

    नशे की हर वस्तु को नष्ट और बरबाद करने का इन्होंने प्रण कर लिया। चाहे जहाँ इन्हें महुआ आदि माक द्रव्य बनाने वाले पेड़ मिलते, उन्हें काट डालतीं। किसी चुनौती, किसी बाधा को मानने के लिए ये ग्रामीण संगठन तैयार नहीं थे। इस प्रकार भारत को सुखी एवं समृद्ध बनाने का यह संघर्ष भारत के स्वतंत्र होने तक चलता ही रहा, अनवरत, अबाध।

    आज जिस स्वतंत्रता का हम उपयोग अथवा उपभोग कर रहे हैं, वह इन्हीं विदुषी दबंग और बलिदानी वीरांगनाओं के रक्तकणों से सुसज्जित है। स्वतंत्र भारत में इस पूजनीय मातृशक्ति को नमन करने और इनके पदचिन्हों पर चलने का यदि हम प्रयास भर भी कर लेते हैं तो हमारा जीवन सार्थक हो जाता है।

    Shagun

    Keep Reading

    The saga of the 'Iron Man'—who united 565 princely states—now arrives on a Delhi stage.

    565 रियासतों को एक सूत्र में पिरोने वाले ‘लौह पुरुष’ की गाथा अब दिल्ली के मंच पर

    ‘नये औजार से कबीर की खुदाई’ ने छेड़ा नया विमर्श, पुस्तकों के बीच गूंजीं कविताएं

    ‘नये औजार से कबीर की खुदाई’ ने छेड़ा नया विमर्श, पुस्तकों के बीच गूंजीं कविताएं

    "Books focus the mind and connect it with traditions" - Brajesh Pathak; Isha-Misha Ratan's Kathak performance captivated the audience

    ‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन

    A Grand Gathering of Books: 23rd 'National Book Fair' to be Held in Lucknow Starting October 1st

    किताबों का महाकुंभ: लखनऊ में 1 अक्टूबर से सजेगा 23वां ‘राष्ट्रीय पुस्तक मेला’

    Union with Emptiness

    शून्यता से मिलन

    Grand launch of two new works by Dr. Vidyasagar Upadhyay on Hindi Diwas

    हिन्दी दिवस पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो नई कृतियों का भव्य लोकार्पण

    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    2nd KN Singh Memorial Cricket Tournament: Hosts Vivekananda Modern Academy defeat SR International

    दूसरा केएन सिंह स्मारक क्रिकेट टूर्नामेंट: मेजबान विवेकानंद मॉडर्न एकेडमी ने एसआर इंटरनेशनल को दी शिकस्त

    October 22, 2026

    भारतीय विशेषज्ञों ने BRICS+ फैशन समिट में AI और कारीगरी पर की चर्चा

    October 21, 2026
    Sonbhadra: Ash from the Anpara Thermal Plant is being brazenly discharged into the Rihand Dam, in blatant violation of NGT orders.

    सोनभद्र: रिहंद डैम में धड़ल्ले से बहाई जा रही अनपरा थर्मल प्लांट की राख, NGT के आदेशों का हो रहा खुला उल्लंघन

    October 18, 2026
    Promotional song 'Jaise Radhe Krishna' from the film 'Darkaar' released; Raja Guru's powerful style grabs attention.

    फिल्म ‘दरकार’ का प्रमोशनल सॉन्ग ‘जैसे राधे कृष्णा’ रिलीज, राजा गुरु के दमदार अंदाज ने खींचा ध्यान

    October 18, 2026
    Lucknow Journalist Association meeting in Bahraich: Discussions held on organizational expansion and journalist unity

    बहराइच में लखनऊ जर्नलिस्ट एसोसिएशन की बैठक: संगठन विस्तार और पत्रकारों की एकजुटता पर हुआ मंथन

    October 18, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading