उत्तर प्रदेश का सबसे पिछड़ा क्षेत्र बुंदेलखंड निज प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद भी विकास की मुख्य धारा से बाहर है। कानून को ताक पर रख कर यहाँ की प्राकृतिक संपदाओं का अंधाधुंध दोहन नित जारी है। पानी की समस्या के कारण अन्नदाता समस्याओं के कारण अवसादों से घिरा रहता है, किसानों के आत्महत्या के मामले में यह उत्तर प्रदेश का विदर्भ कहलाने लगा है।
बुंदेलखंड के अलग राज्य की माँग सालों से उठती आ रही है। किन्तु आवाजें बुलंद होने से पहले ही किसी न किसी कारणवश मंद पड़ जाती हैं और बुंदेलखंड के नये राज्य का सपना केवल कोरा सपना रहकर रह जाता है। कुछ बुंदेलियों में आज भी बुंदेलखंड के अलग राज्य की अलख जगी हूई है। इनकी इस अलख से ही एक नये राज्य की उम्मीद भी साँसें ले रही हैं। जो यहाँ के पिछड़ेपन के लिये वरदान साबित हो सकती है। इसी अलख को साहस देती एक कविता–
बुंदेली लहू की लय
ऐ लहू गरम और तेज रफ्तार से बह।
बुंदेली युवाओं का जोश बनकर बह।।
स्वार्थ में गिर रहे अंश को भस्म कर।
नदी की तरह अविरल प्राण देता बह।।
ऐ लहू नस-नस में यह धुन सवार कर बह।
बुंदेली राज्य के लिए तू बलिदान होने को बह।।
बहुत देख लिए खैरात और घोषणाओं को।
ऐ लहू अब और नहीं तू ठंडा होकर बह।।
निज स्वाभिमान का कुछ तो वजूद दे।
जिंदा हूं जिंदा होने की वजह बनकर बह।।
– राहुल कुमार गुप्त







