Home साहित्य ग़ज़ल: उस कंगन की उम्र बड़ी है 

ग़ज़ल: उस कंगन की उम्र बड़ी है 

0
1362

 

उस कंगन की उम्र बड़ी है

जो मरुथल की प्यास बुझा दे,
उस सावन की उम्र बड़ी है ।
जो स्वर्णिम इतिहास रचा दे,
उस जीवन की उम्र बड़ी है ।

जिसके आदर्शों के आगे,
झुकते राजाओं के वैभव,
जो कष्टों में फूल खिला दे,
उस निर्धन की उम्र बड़ी है ।

तन विषधर का बन्दी हो, पर –
मन की गन्ध – रश्मियों से जो –
वन का वातावरण सजा दे,
उस उपवन की उम्र बड़ी है।

गोरी के गोरे हाथों का,
श्रृंगार बना जो खनका करता,
अन्तिम क्षण तक साथ निभा दे,
उस कंगन की उम्र बड़ी है।

कल्मषता सिर धुन पछताए,
भाव – भरा बस रहे समर्पण,
जो ऐसी निष्ठा उपजा दे,
उस पूजन की उम्र बड़ी है।

निर्जनवन से अंतःस्थल में,
मन्दिर की घण्टियों – सरीखा,
जो प्रियजन में प्यार जगा दे,
उस चितवन की उम्र बड़ी है ।

रूठे – विघटित परिवारों में,
भाई को भाई से मिलकर,
जो रहने का चलन सिखा दे,
उस आँगन की उम्र बड़ी है ।

हर संवेदनशील विन्दु पर –
दृष्टि रहे , फिर समाधान भी,
भटके युग को राह दिखा दे,
उस चिन्तन की उम्र बड़ी है ।

कमल किशोर ‘भावुक’

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here