जैसे कि तुम होकर भी कहीं नहीं हो
बस तुम्हारी यादों से जूझता रहता हूँ
तुम्हारे सपनों को देखता रहता हूँ
तुम्हारी उपलब्धियों को संभालता रहता हूँ
बहुत प्रयास करके भी लगता है जैसे
तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं कर सका हूँ
सचमुच, कुछ भी तो नहीं कर सका हूँ
सिर्फ कोरे आश्वासन आए है तुम्हारे हिस्से मे
भावनाओं का उद्वेग आया है तुम्हारे हिस्से मे
अतृप्त कामनाओं का विनिवेश आया है तुम्हारे हिस्से मे
मैं तो सम्बल बनने की कोशिश भर करता रह गया
संभाला तो तुम्ही ने है सब कुछ अब तक भी
तुम्हारी चाहत ही संभाल रही है सब कुछ
मेरे हिस्से मे जो जिम्मेदारियाँ छोड़ गयी हो तुम
उन्हे भी तो नहीं निभा पा रहा हूँ, मैं ठीक से।
हाँ, एक बात जरूर है
बालकनी मे गुलाब के जो पौधे रोपे थे तुमने
उनमे दो फूल खिले हुए हैं
एकदम तुम्हारी तरह सुंदर और कोमल
मैं और कुछ कर पाया या नहीं
किन्तु उन गमलों मे पानी डालना कभी नहीं भूला
जिनके फूलों मे तुम्हारा चेहरा झलकता है
और ………,
सुगन्ध मे तुम्हारी अच्छाइयाँ महसूस होती हैं।
अरविंद कुमार ‘साहू’
मोबाइल – 9838833434







