हे नारी!- हृदय को झकझोरतीं अलका शुक्ला की कुछ कविताएं

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स्त्री विमर्श व सशक्तीकरण को छूती तथा हृदय को झकझोरतीं कुछ कविताएं –

हे नारी!

हे नारी! उठ कर हिम्मत अब सबला बनकर जीना है।
हाँ! तुम ही इस जग में ईश्वर की अनुपम रचना हो।।
क्यूँ फिर इस दुर्बल मन से जीवन का भार यूँ ढोना है?
तुम तो ममता, प्रेम, दया और करुणा का गहना हो।।
हे नारी! तेरा मन ही तो धरती के धैर्य का आईना है।
हाँ! सब कुछ संभव तुमसे है तुम मातृशक्ति की महिमा हो।।

मेरे घर की सुबह

मेरे घर-मेरे गाँव में नहीं है कोई प्राकृतिक सुंदरता।
नहीं झील-नदियाँ नहीं सागर, पर्वत और पठार।
फिर भी प्रकृति मेरे घर लाती सुबहोशाम बहार।।
मेरे कमरे के रोशनदानों में गौरैया के बच्चों का चहचहाना।
खिड़कियों के आस-पास खेलते बंदरों के छोटे-छोटे बच्चे।
बन चुके हैं ये सब मेरे दोस्त बहुत-बहुत अच्छे।।
सूरज की पहली किरण आकर मुझको दुलारती।
मम्मी-पापा की आवाज मुझे जगाने को जैसे ही आती।
वैसे ही ‘किच्ची’ और चिड़ियाँ भी अपनी भाषा में मुझको जगातीं।।

लड़की होना

बड़ा मुश्किल है यूँ लड़की होना।
मासूम सी,डरी-सहमी सी
बंदिशों में जकड़ी सी…..
बड़ा मुश्किल है अपनी मर्जी रख पाना।
न खुद के मन के विषय थे,न खुद के मन की डिग्रियाँ।
न खुद के मन के कपड़े, न खुद के मन के गहने।
न भाईयों जैसे आजाद थे बस हर काम में टोक के अंदाज थे।
थोड़ा गुमसुम सा होकर भी खुश थे उन बंदिशों उन टोक के अंदाज में।
बड़ा मुश्किल है यूँ लड़की होना।
भोली सी, सीधी सी ख्वाबों में खोयी सी…
बड़ा मुश्किल था ख्वाबों को सच कर पाना।
बड़ा मुश्किल है अपनी मर्जी रख पाना।।

लड़की

जब मैं खोजती हूँ खुद को अपने मन की गहराईयों में।
उलझी पाती हूँ, मैं समाज की ऊँच-नीच की खाईयों में।।
हाँ! मैं नहीं समझ पाती खुद को
कि मेरा वजूद क्या है?
माँ अक्सर बताती, लड़कियों की ज़िंदगी तो होती दुश्वारियों में।।

मेरे देश के लोग

मेरे देश के बहुत से लोगों को
मेरे देश के ही कुछ लोगों ने।
जातियों, मजहब और दलों के
खांचों में रखा है बड़े गर्व से।।
जब जैसे जरूरत पड़ती ये लोगों का वैसे प्रयोग करते।
और लोग भेड़-बकरियों की तरह इनके बहकावे में आते।।
कभी जातिवाद, संप्रदायवाद तो कभी क्षेत्रवाद को लेकर।
खुद आपस में तैयार कर लेते तनाव इतना इन नेताओं को लेकर।।
करें भी क्या ये बहुत से लोग!
इनके अंदर इतने वाद मढ़ दिये हैं, उन कुछ लोगों ने।
कि वह इन विभिन्न वाद के गुलाम के अलावा कुछ नहीं।।
वह बहुत से लोग आजाद नहीं होना चाहते।
गुलामी की परम्परा से मोह तोड़ना नहीं चाहते।।
– अलका शुक्ला
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