सिगरेटों के साथ यादों का धुआं उड़ने लगा,
मंजिलें बदली सफर में कारवां मुड़ने लगा।
बादलों के रूठने से जब ज़मी तपने लगी,
चीर कर धरती का सीना एक कुंआ खुदने लगा।
जब ज़माना ही मुख़ालिफ हो गया था इश्क़ का,
नफरतों की गालियां भी एक शुजा सुनने लगा।
हर सुबह उम्मीद की कमसिन शमा जलने लगी,
रात को उम्मीद का बूढ़ा दीआ बुझने लगा।
-नवेद शिकोह- 8090180256







