Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 513 बात कड़वी हो भले, खोटी न होगी । नत हिमालय की कभी चोटी न होगी । भूख माना, ज़िन्दगी का सत्य कड़वा , राष्ट्र से बढ़कर मगर रोटी न होगी। –भावुक, आस्था की फ़सल से
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन