सोशल मीडिया के मूर्ख!

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व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी

पत्नी मुझे सोशल मीडिया का मूर्ख कहती है। पत्नी है। सच ही कहती होगी! यों भी, पत्नियां अपने पतियों के बारे में ‘झूठ’ कहती कब हैं! खुद के बारे में पत्नी के कहे का पहले कभी बुरा नहीं माना तो अब क्या मानूंगा! यह क्या कम बड़ी बात है कि पत्नी मेरे बारे में ‘कुछ कहती’ है। ‘सही’ कहती है या ‘गलत’; यह अलहदा बहस का मुद्दा हो सकता है। मगर मैं बहस कभी नहीं करना चाहूंगा। पत्नी के कहे पर पति को बहस कभी करनी चाहिए भी नहीं। बहस बेलन में तब्दील होते देर ही कितनी लगती है।

जी हां, मुझे यह स्वीकार करने में रत्तीभर एतराज नहीं कि मैं सोशल मीडिया का मूर्ख हूं। जिनके लिए होगा लेकिन मेरे लिए मूर्ख होना न तो पाप है न शर्मिंदा होने का कोई कारण। खुशनसीब होते हैं वो जिनमें मूर्खता जन्मजात होती है। मुझमें है, इस बात का मुझे गर्व है।

एक मैं ही क्यों सोशल मीडिया पर मौजूद हर शख्स किसी न किसी लेबल पर मूर्ख ही है। अपनी मूर्खता का प्रमाण वो अक्सर अपनी पोस्टों से देता रहता है। कुछ मूर्ख तो इतने महान हैं कि वे 24×7 फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से समाज-दुनिया में क्रांति करने का जोर लगाते रहते हैं। पर क्रांति है की होना तो दूर, उनके आस-पास भी नहीं फटकती। क्रांति कोई लड्डू-पेड़ा थोड़े ही है कि खाया और हो गई।

सोशल मीडिया पर मूर्खता दर्शाने का अपना आनंद है। किसी भी छोटे से छोटे मुद्दे पर ट्रॉलिंग का लेबल चढ़ा कर उसे एकाध दिन खूब भुनाया जा सकता है। जिसे देखो वो ही बहती गंगा में हाथ धोने आ जाता है। आनंद तो वे लोग भी खूब लेते हैं जो अक्सर ट्रोलिंग पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं।

दूसरे की मूर्खता पर हंसना सबसे आसान होता है बा-मुकाबले अपनी मूर्खता पर हंसने के।

मैं तो कहता हूं, सोशल मीडिया की गाड़ी चल ही हम जैसे सोशल मूर्खों के कारण रही है। अगर हम अपनी मूर्खताओं को जग-जाहिर न करें तो न यहां कोई हंसे न मुस्कुराए। सब बुद्विजीवियों की तरह या तो माथे पर बल डाले बैठे रहें या फिर किसी गंभीर विमार्श में अपनी खोपड़ी खपाते रहें। वो तो बुद्विजीवियों ने सोशल मीडिया पर अपना कब्जा जमा रखा है वरना यह प्लेटफॉर्म उनके लिए है ही नहीं। वे तो किताबों के पन्नों पर ही चंगे लगते हैं।

जो करते हों उनकी वे जाने पर मैं सोशल मीडिया पर जरा भी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करता। यह वो जगह है ही नहीं जहां बुद्धि को खर्च किया जाए। यह तो नितांत मनोरंजन की जगह है। जहां आप अपनी निजताओं का त्याग कर सुकून भरी सांस ले सकते हैं। अपने खान-पान से लेकर सोने-जागने तक के सिलसिले को लिख अपनी वॉल भर सकते हैं। तिस पर भी आप जुकरबर्ग को सिर्फ इसलिए कोसते रहें कि उसने आपकी निजता का ख्याल नहीं रखा, तो महाराज आप बहुत बड़े वाले हैं। अपनी निजता अपने हाथ। जुकरबर्ग ने कोई ठेका थोड़े न लिया हुआ है आपकी निजताओं के सरंक्षण का।

लेकिन मुझ जैसे मूर्ख इन सब बोगस चिंताओं में नहीं पड़ते। हम सोशल मीडिया के मूर्खों का कुछ भी निजी नहीं। सबकुछ पब्लिक है। जो भी जब चाहे हमारी मूर्खताओं का आनंद उठा सकता है।

इसीलिए तो मैं पत्नी के मुझको सोशल मीडिया का मूर्ख कहने का बुरा नहीं मानता। अपने पति की काबिलियत को पत्नी से बेहतर कोई समझ सका है भला! नहीं न…!

तो अपनी मूर्खताओं पर खिझिये नहीं, उन्हें एन्जॉय कीजिए। जैसे मैं करता रहता हूं। सोशल मीडिया का लुत्फ खुद मूर्ख बने लिया ही नहीं जा सकता।

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