डॉ दिलीप अग्निहोत्री
प्राचीन भारतीय संगीत मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं है। यह एक साधना है। इसके सतत प्रयास से सिद्धि तक पहुंचा जा सकता है। इसमें स्वर साधना है। नाद को ब्रह्म कहा गया। नृत्य इस विधा की पराकाष्ठा होती है। इसमें भी लय ताल का अनुशासन होता है। यह जीवन को भी अनुशासित करता है। प्राचीन गुरुकुल शिक्षा में युद्ध के साथ संगीत की शिक्षा दी जाती है। भारत में प्राचीन काल से ही संगीत, नृत्य को सामाजिक जीवन में बहुत महत्व मिला। इस पर अनेक ग्रन्थों की रचना हुई। इनकी रचना करने वाले ऋषि की श्रेणी में प्रतिष्ठित हुए। उनका कहना था कि जीवन के उल्लास की सर्वश्रेठ अभिव्यकि नृत्य से ही होती है। हमारे तो देवता भी अपनी लीला में नृत्य को शामिल करते थे।वर्तमान भारतीय परिवेश में इस पर विचार करना चाहिए। यदि किसी विद्यार्थी की भारतीय संगीत में रुचि है तो उसका उत्साह वर्धन करना चाहिये। अपनी समूर्ण सम्पत्ति शिक्षण संस्थाओं के निर्माण में दान करने वाले लखनऊ के वीएन विद्यांत जी का इस भारतीय मान्यता पर विश्वास था। वह स्वयं वीणा बजाने में सिद्धहस्त थे। अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में भी शामिल होते थे। अनेक संगीत विद्यालयों को आर्थिक सहायता देते थे। दुर्गा पूजा पर आराधना नृत्य को वह संवर्धन व प्रोत्साहन देते थे। उनके द्वारा स्थापित विद्यांत कालेज संस्थापक दिवस समारोह का प्रारंभ भारतीय नृत्य से हुआ। प्रायः ऐसे समारोहों के प्रारंभ में सरस्वती वंदना का गायन होता है। लेकिन यहां के विद्यार्थी राहुल सिंह ने पहले सरस्वती वंदना फिर उसी में प्रथम पूज्य गणेश जी की वंदना जोड़ कर आकर्षक प्रस्तुति दी। राहुल को लखनऊ महोत्सव में भी नृत्य के लिए सम्मानित किया गया था।
कत्थक की दुनिया में लखनऊ घराने की विशेष पहचान है। कथक सम्राट पद्मविभूषण बिरजू महाराज का नाम भी इससे जुड़ा है। यह सुंदर सन्योग है कि बिरजू महाराज बचपन में विद्यांत स्कूल के ही विद्यार्थी थे। उनका कहना है भारतीय संगीत चिंतन की दिशा ही बदल देती है। इसके साधक को सम्पूर्ण प्रकृति में संगीत ही दिखाई देता है। हवा चलने की आवाज में वह संगीत सुनता है, चिड़िया जब चहकती है, तो उसको भी वह संगीत का हिस्सा मानता है। फूल के खिलने में भी सुंदर संगीत होता है। बिरजू महाराज की एक दुर्लभ रचना है। जिसमें वह केवल हाथ की उंगलियों के माध्यम से सूर्योदय, फूलों का खिलना, चिड़िया का दाना लेकर अपने बच्चे के पास जाना, बच्चों का दाना खाने का उपक्रम करना, प्रस्तुत किया जाता है।
जब हम प्रकृति और सभी जीव जंतुओं में संगीत का भाव देखेगे तो किसी के प्रति नफरत नहीं होगी। सबके प्रति सौहार्द होगा। हिंसा का भाव नहीं आएगा।बिरजू महाराज को अपना आदर्श मानने वाले अंजुल कुमार विद्यांत हिन्दू पीजी कालेज में बीए द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी है। उन्होंने संस्थापक दिवस में लखनऊ घराने की कत्थक शैली का नृत्य प्रस्तुत किया।
भारतीय संगीत का समृद्ध दायरा यहीं तक सीमित नहीं है। लोक संगीत की हमारी धरोहर अद्भुत है। प्रत्येक क्षेत्र का अपना विशिष्ट संगीत होता है। ऐसी विविधता विश्व में कही नहीं है। यह अच्छी बात है कि हमारा समाज केवल अपने इलाके के ही नहीं अन्य स्थानों के संगीत में गहरी दिलचस्पी रखता है। परोक्ष रूप से इसकी विशेषता भले ही दिखाई न दे, लेकिन यह हमारी राष्ट्रीय एकता, अखंडता, सौहार्द की भावना को मजबूत करते है। संस्थापक दिवस में विद्यांत पीजी कालेज के विद्यर्थियो ने पंजाब का भांगड़ा, और प्रायमरी की बालिकाओं ने राजस्थानी लोकनृत्य प्रस्तुत किया। महाविद्यालय के प्रबंधक प्रबंधक शिवाशीष घोष, प्रचार्या प्रो धर्म कौर और संयोजक डॉ राजीव शुक्ला ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले विद्यार्थियों को पुरष्कृत किया। इनके नाम राहुल सिंह, विशाल, विभांशु, मुस्कान, शिखा, बसरा, मुकेश, बृजेश, रिया रंजनापूजा,विशाखा है। महाभारत में भी कथक का वर्णन है। इसका सम्बन्ध कृष्ण कथा और नृत्य से था।
लखनऊ का कालिका बिन्दादिन ड्योढ़ी में कत्थक का केंद्र था। बिरजू महाराज के दो चाचा व ताऊ, शंभु महाराज एवं लच्छू महाराज भी कत्थक के साधक थे। इनके पिता अच्छन महाराज थे। जिन्होंने बिरजू महाराज को संगीत शिक्षा दी। बिरजू महाराज ने कत्थक नृत्य में नए रंग जोड़े। इन्होंने पन्द्रह सौ ठुमरियों का कमोजिशन किया। लखनऊ घराना कथक नृत्य शैली में छोटे टुकड़ों का महत्व होता है।
नृत्य के बोलों के अतिरिक्त पखावज की परने और परिमलु के बोल भी नाचे जाते हैं। यह सन्तोष का विषय है कि विद्यांत हिन्दू पीजी कालेज के अनेक विद्यार्थी लखनऊ घराने के नृत्य को सीख रहे है। राहुल सिंह और अंजुल राष्ट्रीय स्तर के संगीत समारोहों में कई बार प्रदर्शन कर चुके है। वीएन विद्यांत जी की भी यही इच्छा थी।






