नून रोटी खाएंगे, जिंदड़ी तेरे संग बिताएंगे, ठीक हाय !!

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यदि आप भगवान् के गुन गाना चाहते हैं तो उसके लिए तो रूखी-सूखी रोटी खाना ही सबसे उपयुक्त है। ऊपर से ठंडा पानी मिल जाए तो क्या कहने। इससे व्यक्ति की सात्विकता बनी रहती है। लेकिन अगर सरकार के गुण गाना चाहते हैं तो फिर नून-रोटी भी चलेगी। दोनों से ही उदात्तता की भावना का संचार होता है। कहीं कोई लालच नहीं, कहीं कोई विरोध, प्रतिरोध नहीं, कहीं कोई असंतोष नहीं।

आत्मतुष्टि का ऐसा संचार होता है कि या तो आदमी ऊपर वाले में लौ लगा लेता है, या फिर सरकार को वोट देने निकल पड़ता है। वोट देना इसलिए जरूरी हो जाता है कि जहां नून आ गया तो समझो उसका हक तो अदा करना ही पड़ता है। रोटी को जरा-सा चुपड़ा हुआ देखा नहीं कि जी ललचा जाता है। लालच बुरी बला होती है। सरकार इस बारे में पूरी तरह सजग रहती है। इसलिए वह चुपड़ी हुई कभी नहीं दिखाती, ललचाती नहीं है। वह रूखी-सूखी देकर या नून-रोटी देकर तुष्ट करती रहती है, जिससे आत्मतुष्टि बनी रहती है। पर इधर रूखी-सूखी को तो कोई याद ही नहीं कर रहा। सब नून-रोटी की बात कर रहे हैं। मतलब यह कि अब का प्रभु से ध्यान हटकर सरकार पर ध्यान लग गया है। यह ध्यान वैसे नहीं लगा है जैसे प्रभु में लगता है, यह तो नजर लगने की तरह लगा है। इसके अपने खतरे हैं।

एक तो इससे इन आध्यात्म टाइप की चीजों में सांसारिकता की घुसपैठ हो जाती है। सरकार घुसपैठ के पूरी तरह खिलाफ है। दूसरे अब इसकी सीख तो दी जा सकती है कि रूखी-सूखी खाए के ठंडा पानी पी। प्रचारक सिर्फ वैसे ही नहीं होते न जिस तरह के प्रचारकों का आजकल बोलबाला है। आखिर, तो धर्म प्रचारक भी होते ही हैं न। पर नून-रोटी की बात करने का गलत अर्थ निकल सकता है।

इसे सरकार के खिलाफ प्रचार माना जा सकता है, जो आगे जाकर देशविरोधी प्रचार भी कहला सकता है। अगर आपने नून-रोटी का वीडियो बना लिया तो जेल जाने से आपको कोई नहीं बचा सकता। इसलिए नून-रोटी का जिक्र करना आजकल उचित नहीं है। लोग नून का गलत इस्तेमाल भी करते हैं। उसे रोटी का साथी बनाने की बजाय जख्मों पर छिड़कने लगते हैं। अब कुछ जख्म तो सरकार के भी होते ही होंगे। नहीं क्या? इसलिए उन पर नून मत छिड़किए। नून का सिर्फ रोटी के लिए इस्तेमाल कीजिए और आत्मतुष्ट रहिए।

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