जब झूठ पे एकाधिकार था बस उसी का प्रचार था।
देश में फैला नाम था लोगों में उनका मान था।।
मीडिया-सोशल मीडिया में जय-जयकार थी।
झूठ के देवताओं में खुशी, वतन को नई आस थी।।
देश का सिंहासन मिला, झूठ का बाजार खिला।
पहले ताकतवर झूठ का निर्बल सत्य से टकराव हुआ।
फिर वोट के बाजार में झूठ का एकाधिकार खत्म हुआ।।
देश में नफ़रतों का फिर सिलसिला शुरू हुआ।
ऐसा पिछले पंचवर्षीय साल के हर पल का हाल था।।
इस नये चुनावी साल से भी कोई नहीं आस अब।
झूठ और नफ़रत का ही लगता है रहेगा राज अब।।
झूठ की महिमा जान हर दल झूठ पर मेहरबाँ हुआ।
जनता का होगा क्या, लोकतंत्र तो दलों का दास हुआ।।
– राहुल कुमार गुप्त






