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    Home»ब्लॉग

    वहशी होते समाज के बीच मासूम बच्चे!

    By September 28, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    समाज को हम किस ओर लिए जा रहे हैं यह हमें भी नहीं मालूम। बस चले जा रहे हैं। एक होड़ या कहूं एक जिद-सी है हमारे भीतर एक-दूसरे को ‘मात’ दे आगे निकल जाने की। आगे निकल जाने की यह घुड़-दौड़ हमसे कितना कुछ छीनती जा रही है, शायद हमें इसका अहसास भी नहीं। अगर अहसास हो तो भी हम उसे ‘महसूस’ नहीं करना चाहते।

    हमारा समाज निरंतर ‘हिंसक’ और ‘वहशी’ बनते जाने को ‘अभिशप्त’ है। किसी का किसी को कोई ‘लिहाज’ नहीं। मन और शरीर के भीतर दबी कुंठाएं इस कदर बढ़ गई हैं कि उन्हें किसी भी तरह बाहर निकालना है। ऐसे कुंठित लोग यह भी नहीं देखते कि वे दैहिक शोषण स्त्री का कर रहे हैं या मासूम बच्चों का। खासकर, स्त्रियों के साथ शारीरिक, समाजिक, पारिवारिक शोषण की घटनाएं इतनी तादाद में सामने आने लगी हैं, कभी-कभी ऐसी खबरों को पढ़ और जानकर डर-सा लगता है। लगभग यही हाल हमारे मासूम बच्चों का भी है। बच्चों के प्रति शारीरिक दुराचार के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उनके भविष्य की चिंता सताने लगी है। जिन बच्चों में अपने कल व देश के सुनहरे भविष्य की उम्मीदें हम पालते हैं, उन्हीं का शोषण कर पौधे को बड़ा होने से पहले ही काटने पर तुले हैं हम।

    हाल में गुरुग्राम के एक बड़े स्कूल में एक मासूम के साथ घटी दैहिक शोषण की घटना क्या हमारे कान नहीं खोलती? हेल्पर ने मासूम बच्चे का गला रेत डाला। दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की उम्र ही कितनी होती है। उस मासूम को तो कुछ मालूम भी न होगा कि उसके साथ कितना ‘वहशी बर्ताब’ किया गया। फूल को खिलने से पहले ही उसे बेरहमी से तोड़ डाला गया। उक्त खबर पढ़कर ही हम भीतर से कितना हिल गए होंगे। लेकिन पूछिए जरा उस मासूम के मां-बाप से उनके दिलों पर क्या गुजरी होगी? उन्हें जीवन में मिला यह एक ऐसा ‘घाव’ है, जिसे अच्छे से अच्छा ‘मल्लम’ भी नहीं भर सकता। बेटे के न रहने के दर्द ने उनके पूरे जीवन का सुख-चैन छीन लिया।

    ये कैसे यौन कुंठाओं से पीड़ित दरिंदे हैं, जिन्हें यह तक होश नहीं रहता कि वे मासूमों के साथ क्या गलत कर रहे हैं। यौन कुंठाओं की चरस का नशा उनके दिमाग पर कुछ तरह तारी रहता है कि वे यह भूल जाते हैं उनका किया कुकर्म किसी मासूम को हमेशा के लिए अंधेरे कुंए में भटकने को मजबूर कर सकता है। उन्हें अपनी ही आत्महत्या के लिए उकसा सकता है। उनसे उनकी सांसे छीन सकता है।

    शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो जब हमारे समक्ष मासूम बच्चों के साथ यौन या मानसिक शोषण की खबरें न आती हों। अखबार या सोशल मीडिया पर आने वाली हर दूसरी खबर किसी न किसी बच्चे के देह-शोषण से जुड़ी होती है।

    न केवल बाहर अपने घर-परिवार में भी बच्चे गाहे-बगाहे ऐसी घटनाओं से दो-चार होते रहते हैं। पता चलता है कि उनके ही परिवार के करीबी सदस्य उनका यौन तिरस्कार करते रहे। समाज में जाने कितनी ऐसी मासूम बच्चियां हैं जो अपने पिता, अपने भाई, अपने मामा-चाचा की गलत हरकतों का शिकार हो चुकी हैं। कुछ तो परिवार वालों के खौफ के चलते मुंह भी नहीं खोल पातीं।

    पाप के इस खेल में कोई एक नहीं बल्कि जिम्मेदार हम सब हैं। वजहें बेशक अलग-अलग हो सकती हैं। धीरे-धीरे कर हम एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं जहां यौन कुंठाएं इस कदर हमारे दिलो-दिमाग पर हावी होती जा हैं कि हम इसके अतिरिक्त न कुछ देखना चाहते हैं न समझना। पता नहीं हमारे जिस्म की यह कैसी भूख है, जो बड़ी ही बेरहमी और बेशर्मी के साथ मासूमों को अपना निवाला बनाने से नहीं रोक पा रही।

    पैसे, नौकरी और सोशल मीडिया की भेड़चाल में लिप्त मां-बापों के पास समय ही नहीं अपने बच्चों के साथ बीताने को। उसका खामियाजा किसी न किसी रूप में हमारे बच्चों को झेलना पड़ रहा है। दुख होता है, अपने मासूम बच्चों को यों किसी वहशी की यौनिकता का शिकार होता देख।

    ऐसे यौन पिपासुओं के विरूद्ध इतने सख्त कानून बनाएं जाएं कि वे तो क्या कोई भी मासूम बच्चों या स्त्रियों के साथ गलत हरकत करने की सोच तक नहीं। पता नहीं वो दिन कब आएगा?

    अंशुमाली रस्तोगी

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