बाघ विलुप्त हुए तो बिगड़ेगा पर्यावरण संतुलन!

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बाघ बचेंगे तो हम भी

पिछले दिनों उत्तर भारत में बढ़े वायु प्रदूषण ने पर्यावरण की बिगड़ती दशा को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्थिति अभी और घातक होने वाली है। वजह यह है कि परिस्थितिकीय असंतुलन को खत्म करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। नदियां प्रदूषित हो रही हैं। पहाड़ खंडित किए जा रहे हैं और जंगल मैदान में तब्दील हो रहे हैं। वन संपदा चौपट हो रही है। सबसे भयंकर पहलू यह है कि वन्य जीवों खासकर बाघों को विचरण के लिए सुरक्षित स्थल नहीं मिल पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय शोधों से साबित हुआ है कि बाघों का संरक्षण पर्यावरण को व्यवस्थित रखने के लिए बेहद जरूरी है। यह सिर्फ भारत के लिए ही नहीं दुनिया भर के लिए चिंता का विषय है।

घों की संख्या घटती जा रही है। कहने को इस संकट को दूर करने की कुछ पहल हुई है। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के मौके पर अगले छह साल में संरक्षित बाघों की संख्या दुगनी करने का सरकारी संकल्प किया गया। इस पर गंभीरता से अमल करने की जरूरत है। सवाल सिर्फ संख्या का नहीं उपयोगिता का है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों के संरक्षण से पारिस्थितिकीय, वानस्पतिक समेत कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सुधार होगा। आंकड़ों की बात करें तो बाघ संरक्षण संगठनों और सभी देशों के सरकारी आंकड़ों के आधार पर वल्र्ड वाइल्ड लाइफ फंड और ग्लोबल टाइगर फोरम की रिपोर्ट है कि दुनिया में इस समय 3890 बाघ हैं। दोनों एजेंसियों के मुताबिक सौ साल में पहली बार बाघों की संख्या बढ़ी है। 1900 में दुनिया में एक लाख से ज्यादा बाघ थे जो 2010 में 3200 रह गए। 2016 में बाघों की आबादी वाले तेरह देशों में जिन 3890 बाघों के होने की पुष्टि की गई, उनमें सबसे ज्यादा 2226 भारत में हैं।

अगले छह साल में उनकी संख्या दुगनी करने का संकल्प पूरा करना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा हो पाएगा, इसकी उम्मीद बांधने का थोड़ा बहुत आधार है। वल्र्ड वाइल्ड लाइफ फंड और ग्लोबल टाइगर फोरम की मानें तो पिछले पांच साल में भारत में बाघों की संख्या 1706 से 2226 हुई है। कुछ और सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के अशोक वन्य जीव अभयारण्य में वन अधिकारियों को बारह हजार से चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर बाघ होने के प्रमाण मिले हैं। कुमाऊं के तराई ईस्ट डिवीजन में 32 बाघों की पहचान हुई है। सरिस्का में ग्यारह साल बाद बाघ मिला है। अवैध शिकार की वजह से सरिस्का बाघ संरक्षण क्षेत्र से बाघ लुप्त हो गए थे। रणथंभौर से सात बाघ भेजे जाने के बाद अब इस संरक्षण क्षेत्र में बाघों की संख्या बारह हो गई है। असम के बोडोलैंड के मानस राष्ट्रीय और भूटान के रायल मानस राष्ट्रीय पार्क के बीच 2011-12 के 14 बच्चों की तुलना में अब उनकी संख्या बढ़ कर 21 हो गई है।

बहरहाल, पूरी दुनिया में बाघों की संख्या का बढऩा और उसमें भारत की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी इसलिए ज्यादा उत्साहजनक है क्योंकि दो साल पहले तक इस मोर्चे पर निराशा की स्थिति बनी हुई थी। वल्र्ड वाइल्ड लाइफ फंड ने ही 2014 में अपनी रिपोर्ट में चिंता जताई थी कि 1970 से 2010 तक के चालीस साल में जहां मानवीय आबादी दो गुना बढ़ गई है, वहीं वन्य जीवों की संख्या 52 फीसद से ज्यादा कम हो गई है। रिपोर्ट का कहना था कि वातावरण में कार्बन की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि इससे इको सिस्टम बुरी तरह लडख़ड़ा गया है। इससे वन्य जीवों का प्राकृतिक स्थल प्रदूषित हो गया है और इससे बाघ भी कम प्रभावित नहीं हुए हैं। सौ साल में 97 फीसद बाघ विलुप्त होने की रिपोर्ट में बड़ा खतरा बताया गया था।

जीव विज्ञान की परिभाषा में बाघ को पेंथेरा टिगरिस कहा जाता है। पारंपारिक रूप में बाघ दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और रूस के सुदूर पूर्व हिस्से में हैं। 2014 में अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के मौके पर जारी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि इन क्षेत्रों में बाघों की संख्या 3948 हो सकती है। भारत के बाद इस समय मलेशिया में ढाई सौ, बांग्लादेश में 106, रूस में 433, इंडोनेशिया में 371, थाइलैंड में 189 और नेपाल में 198 बाघ होने का अनुमान है। 2014 में म्यांमार (85), भूटान (75), चीन (45), कंबोडिया (20), विएतनाम (20) व लाओस (17) में भी बाघ देखे गए थे। ताजा रिपोर्ट में म्यांमार का जिक्र नहीं है क्योंकि वहां बाघों की गणना ही नहीं की गई। बाकी देशों में बाघों की संख्या तेजी से घटी है। सौ साल में बाघों की संख्या जितनी तेजी से घटी, उससे यह आशंका जताई जाने लगी थी कि बाघ प्रजाति के पूरी तरह विलुप्त होने में अब ज्यादा समय नहीं लगने वाला।

बाघों की नौ उप प्रजातियों में से तीन- बाली टाइगर (पीटी बालीका) पिछली सदी के पांचवे दशक में, कैस्पियन टाइगर (पीटी विरगाटा) आठवें दशक में और जावा टाइगर (पीटी सोंनडाइका) नवें दशक में अपना नामो निशान खो चुकी है अब छह प्रजातियां बची हैं। इनमें बंगाल टाइगर प्रमुख है। माना जाता है कि ये भारत, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल व चीन में पाए जाते हैं और इनकी कुल संख्या 1850 है। रूस के सुदूर पूर्व में साइबेरियन प्रजाति के साढ़े चार सौ बाघ होने का अनुमान है। इंडोचाइनीज प्रजाति के बाघ मुख्य रूप से कंबोडिया, चीन, मलेशिया, म्यांमार, थाइलैंड व विएतनाम में देखे गए हैं। इनकी संख्या साढ़े तीन सौ के आसपास बताई जाती है। दक्षिणी थाइलैंड व मलेशिया में पाए जाने वाले मलाया प्रजाति के बाघों की अनुमानित संख्या पांच सौ है। माना जाता है कि इंडोनेशिया सुमात्रा द्वीप में सुमात्रा प्रजाति के करीब चार सौ बाघ हैं। बाघों की एक और प्रजाति दक्षिण चाइना है लेकिन पिछले 25 साल में इस नस्ल के एक भी बाघ के किसी को दर्शन नहीं हुए हैं।

बाघ परिवार के चित्र दिखा कर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की सफलता को खूब प्रचारित कर धन ऐठा गया

बाघों के सामने एक और बड़ा खतरा है। अप्रैल 2016 तक दुनिया में जो 3890 बाघ थे वे बाघ संरक्षित क्षेत्र के थे, अपने लिए तय जंगलों में स्वच्छंद विचरण करने वाले। भारत में बाघों के लिए संरक्षित क्षेत्रों में अनियंत्रित विकास ने एक बड़ी समस्या पैदा कर दी है। 1990 के पूरे दशक में 1970 व 1980 के दशक के शुरुआती सालों की कथित सफलता की आत्ममुग्धता में देश रहा जबकि इस बीच जंगलों को तहस नहस किया जाना जारी रहा। पत्रिकाओं और वृत्त फिल्मों में संरक्षित जंगलों में धूप सेंकते बाघ परिवार के चित्र दिखा कर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की सफलता को खूब प्रचारित किया गया। 1991 में आर्थिक नीति उदार किए जाने की झोंक में हजारों हेक्टेयर की वन्य भूमि में खदानों, सडक़ों, बांधों व बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई। 1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट और 1980 का फारेस्ट कन्जरवेशन एक्ट इस सिलसिले को कुछ हद तक ही रोक पाया। 1990 के दशक में भारतीय बाघों की दुर्दशा की कहानी मीडिया के जरिए बाहर आनी शुरू हुई।

अंतरराष्ट्रीय धर्मार्थ ट्रस्टों ने लोगों से करोड़ों रुपए लिए। बाघ की सुरक्षा के नाम पर फंड जुटाने का चलन शुरू हुआ। सरकार ने भी प्रोजेक्ट टाइगर को खूब फंड दे दिया। पर नतीजा कोई ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं रहा। खदानों, सडक़ों, बिजली परियोजनाओं और उद्योग धंधों के अलावा लकड़ी माफिया ने राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों को लीलना शुरू कर दिया। वन भूमि का बड़े पैमाने पर अन्य कामों के लिए इस्तेमाल होने लगा। 1990 के दशक के मध्य तक बाघों से उनका एक बड़ा इलाका छिन चुका था। यह तो 2004 में जाकर सरिस्का की दुर्दशा की खबर आने के बाद सरकार को होश आया कि प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआती सफलता के बाद अब बाघों को हमेशा के लिए खोने का खतरा खड़ा हो गया है। सरकार ने फटाफट टाइगर टास्क फोर्स बनाई लेकिन यह तय करने की बजाए कि कैसे विकास कार्यों की वजह से संरक्षित क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं और कैसे वन क्षेत्र को बचाने व मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए, टास्क फोर्स ने बिल्कुल उलटी दिशा पकड़ ली और इसे राष्ट्रीय उद्यान बनाम आम आदमी के मुद्दे में बदल दिया।

राजनीति से जुड़े लोगों ने अनुसूचित जनजाति व वनों में पारंपरिक रूप से रहने वाले लोगों की सुविधा के लिए वन अधिकार को मान्यता देने वाले 2006 के कानून को तुरंत पास करा दिया। माहौल भांप कर पर्यावरण व वन मंत्रालय ने कोस्टल रेगुलेशन जोन रूल्स व पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 को भी नरम कर दिया। यह विचित्र स्थिति थी। दुनिया में बाघों को बचाने की मुहिम से कदम ताल मिलाते हुए एक तरफ तो बाघों को बचाने की दुहाई दी जा रही थी। दूसरी तरफ छोटे और बड़े उद्योगपतियों के इशारे पर राजनीतिज्ञ बाघों के कदम के नीचे की जमीन खींचने में लगे हुए थे। पैसे और वोटों के लालच ने बाघों की रिहाइश वाले व आसपास के क्षेत्रों में खदान, बांध, सडक़, रासायनिक परिसर व परमाणु रिएक्टर तक लगाने की योजना बना ली गई। इससे हुआ यह कि 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ था तो उस समय बाघों की जो बसावट अच्छी खासी स्थिति में थी, उसमें से आधी से ज्यादा नष्ट हो गई।

बाघों की आबादी वाले वनों को छह परिसरों में चिन्हित किया गया है। ये हैं- शिवालिक-गंगा प्लेंस, सेंट्रल इंडियन लैंड स्केप काम्पलेक्स, ईस्टर्न घाट, वेस्टर्न घाट, नार्थन हिल्स व ब्रह्मपुत्र प्लेंस और सुंदर वन। सभी की कहानी एक सी है। मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संघर्ष, गैर जरूरी विकास परियोजनाएं, अवैध शिकार और वन्य जीवों के रिहायशी क्षेत्र में अतिक्रमण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। विकास परियोजनाएं, राजनीतिक दखलंदाजी, पर्यटन कार्यक्रम, मानव व वन्य जीवों का संघर्ष, वन्य जीव जंतुओं का अवैध कारोबार और जंगल में यदा कदा लगने या लगाई जाने वाली आग बाघों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने बाघ संरक्षण स्थलों के कोर इलाके में पर्यटन पर प्रतिबंध लगा दिया था और नौ राज्यों को निर्देश दिया था कि ऐसे संरक्षित स्थलों के कोर व बफर क्षेत्रों को वे अधिसूचित करें।

सालों से यह व्यवस्था करने की कोशिश की जा रही है कि कोर क्षेत्र को सभी इंसानी गतिविधियों से मुक्त रखा जाए और उसे घेरने वाले बफर क्षेत्र की जमीन का मिश्रित उपयोग तो हो लेकिन संरक्षण पर केंद्रित हो। बढ़ी हुई आबादी के दबाव और पिछले कुछ सालों में बाघ सुरक्षित स्थलों के आकार में विस्तार ने समस्या तो खड़ी की ही है।

आज भी ज्यादातर बाघ संरक्षित स्थलों के कोर क्षेत्र में गांव बसे हुए हैं। सडक़, रेल की पटरियां और पूजा स्थल अलग से हैं। सुप्रीम कोर्ट के बाघ संरक्षित स्थलों में पर्यटन पर रोक लगाने के निर्देश को पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों ने इस आधार पर विरोध किया कि ज्यादातर बाघ संरक्षण स्थल दूर दराज के इलाकों में हैं और वहां की आर्थिक गतिविधियों का आधार ही बाघ पर्यटन है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इस आधार पर भी विरोध हुआ कि पर्यटन से बाघों के अवैध शिकार पर नियंत्रण रहता है। कहा गया कि इससे इन स्थलों में गैरकानूनी गतिविधियों पर भी रोक लगती है।

बाघों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके लिए संरक्षित स्थलों में उन्हें सहजता से रहने नहीं दिया जाता। बाघ संरक्षित स्थलों में होटल व रिसार्ट की भरमार ने भी पारिस्थितिकीय को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। इसका दुष्प्रभाव नजर भी आने लगा है। देश में इस समय 47 टाइगर रिजर्व हैं। उनके संरक्षण पर इस हिसाब से ध्यान देने की जरूरत है जिससे उन क्षेत्रों की प्राकृतिक जलवायु व वातावरण प्रदूषित न हो। ऐसा हुआ तो बाघ तो सुरक्षित रहेंगे ही, प्रकृति जितना देगी उसे करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करके भी नहीं जुटाया जा सकता।

बड़ा खतरा:  अवैध शिकार

सरकारी प्रयासों की बात करें तो पिछले तीन साल से हर साल बाघों के संरक्षण पर डेढ़ सौ करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जा रहे हैं। एक बाघ को वयस्क होने में चार से पांच साल लगते हैं। बाघ की उम्र आठ से दस साल मानी जाती है। लेकिन कई बाघ उम्र पूरी होने से पहले अवैध शिकारियों का निशाना बन जाते हैं। कितने बाघ मारे जाते हैं, इसके आंकड़े भी अलग-अलग है। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी आफ इंडिया (डब्ल्यूपीएसआई) की रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में 61 और 2012 में अक्टूबर तक 71 बाघों की मौत हुई। इसी संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में पहली बार जनवरी से 26 जुलाई तक 74 बाघों की जान गई। डबल्यूपीएसआई के मुताबिक 14 बाघों की करंट लगने, जहर देने से मौत हुई। सोलह अवैध शिकारियों का निशाना बने। 26 बाघ आपसी संघर्ष, बीमारी, बढ़ती उम्र व ट्रेन और सडक़ हादसे में मरे। छह महीने में उत्तराखंड व महाराष्ट्र में नौ-नौ और कर्नाटक में आठ बाघ मारे गए। इस मोर्चे पर बाजी मारी मध्य प्रदेश ने। जहां 19 बाघों की अलग-अलग परिस्थितियों में मौत हुई।

बाघों के लिए सबसे बड़ा खतरा उनके अवैध शिकार का है। मरा हाथी सवा लाख का होता है लेकिन मरा बाघ 25 लाख रुपए दे जाता है। बाघ के अंगों और खाल को नेपाल के जरिए चीन के बाजारों में भेजने से इतना पैसा मिल जाता है। बाघ के अंगों से खाड़ी देशों, अमेरिका व इंग्लैंड में सेक्स को बढ़ावा देन वाली दवाइयां बनती हैं। एक बाघ के अंगों से ऐसी तीस हजार से ज्यादा गोलियां बन जाती हैं। बाघ की खाल और हड्डियों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में खासी मांग है। लेकिन बांघ जिंद रहे तो दो बाघ एक साल में 530 करोड़ रुपए का आर्थिक लाभ दे सकते हैं।

– श्रीशचंद मिश्र

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