थप्पड़ धर्मनिरपेक्ष होता है

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व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
थप्पड़ धर्मनिरपेक्ष होता है। जूते की तरह। थप्पड़ अदृश्य होता है। ईश्वर की तरह। थप्पड़ का कुछ पता नहीं रहता, वो किधर से भी आ सकता है। थप्पड़ सौ फीसद बीमारी की तरह होता है। बिन बताए कभी भी किसी भी वैक्टीरिया के रास्ते आ सकता है।
मैं, सच कह रहा हूं, जितना अपनी बीवी से नहीं डरता उतना या उससे अधिक उसके थप्पड़ से डरता हूं। जिस दिन बीवी को पहले-पहल देखा था, तब ही कह दिया था- हमारे बीच समस्त बातें केवल मुंह के रास्ते होंगी, थप्पड़ के नहीं। तब से अब तक गाड़ी बिल्कुल ट्रैक पर चल रही है।
बचपन में मैंने बहुत थप्पड़ खाए हैं। जला हूं इसलिए छाछ भी फूंक-फूंककर पीता हूं। सबसे ज्यादा थप्पड़ खाने का सौभाग्य ‘पढ़ाई न करने’ और ‘पतंगबाजी’ करते रहने पर ही खाए हैं। बस एक दफा दो थप्पड़ मोहल्ले के एक ऊंचे दादा से खाए थे, उसकी प्रेमिका को छेड़ने के एवज में।
थप्पड़ यों तो बुरी बला है पर एक दफा पड़ने के बाद सातों पुश्तों के नाम ताउम्र याद करवा देती है। कुछ तो ऐसे भी महा-पुरुष हैं, जिन्होंने जन्म ही धरती पर थप्पड़ खाने के लिए लिया है। उनको मेरा शत शत नमन।
सुनाई में आ रहा है, अभी फिर से किसी ऊंचे नेता के गाल पर किसी बंदे ने थप्पड़ पर हाथ साफ किया है। जो किया, जिसने किया मैं उसकी ‘कड़ी निंदा’ करता हूं। हिंसा कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दोषी को सजा अवश्य मिलनी चाहिए।
लेकिन थप्पड़ खाने की आदत डालनी भी ठीक नहीं। एक तो सरेआम इज्जत पर बट्टा लगता है, दूसरा रिश्तेदार खिंचाई करते हैं सो अलग।
मेरे विचार में सरकार को थप्पड़ के लिए एक मजबूत अध्यादेश लाना चाहिए ताकि ‘थप्पड़-प्रथा’ पर हमेशा के लिए रोक लगाई जा सके।

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