अंशुमाली रस्तोगी
कुछ लोग धरती पर जन्म सिर्फ विरोध करने के लिए लेते हैं। विरोध क्यों कर रहे हैं? किसलिए कर रहे हैं? इससे उन्हें खास कोई मतलब नहीं रहता। उन्हें विरोध करना है तो करना है।
आप यह न समझिएगा कि वे विरोधी स्वभाव के होते हैं। न न ऐसा उनके साथ कुछ नहीं होता। विरोध तो वे इसलिए जताते रहते हैं ताकि अपने ‘मन की भड़ास’ निकाल सकें। दरअसल, मन की भड़ास ही उनका विरोध होती है।
इन दिनों उनका विरोध तेल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ भड़का हुआ है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब वे तेल की आड़ में सरकार को न कोसें। कोसने वालों में विपक्ष के लोगों की भूमिका बड़ी है। वे बतलाना चाहते हैं कि सरकार की बेरुखी और तेल की ऊंची कीमतों से एक अकेली जनता ही नहीं बल्कि वे भी उतना ही त्रस्त हैं। वे कितना त्रस्त हैं ये, उनके कड़ी धूप से लस्त-पस्त चेहरे, बहुत अच्छे से बता देते हैं। 47 डिग्री टेम्परेचर में सड़क पर सरकार के विरोध में उतरना कोई हंसी खेल नहीं है जनाब।
ज्यादातर विरोध करने वालों में वो क्लास ही आगे रहती है, जिसके घर में हर किसी की अपनी अलग गाड़ी होती है। तेल के दाम चाहे 80 रुपए हों या 100 उनकी सेहत पर खास असर नहीं डालते। लेकिन विरोध तो उन्हें करना है न। पब्लिक को भी यह बताना है कि भाई, एक अकेले तुम ही नहीं, तेल की आग में हम भी बराबर झुलस रहे हैं।
कुछ विरोध अक्सर इसलिए भी जताए जाते हैं ताकि समाज के बीच विरोध की प्रासंगिकता कायम रह सके। बाकी विरोध में कितने प्रतिशत ‘विरोध’ होता है और कितने प्रतिशत ‘विट’; यह हम बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं।
गजब तो ये है कि तेल इतना महंगा होने के बाद भी न सड़कों पर न घरों में गाड़ियां कम नहीं हो रहीं। जबकि अब गाड़ियों को चलाने के लिए सड़कें कम पड़ने लगी हैं। फ्लाई-ओवर बनाए जा रहे हैं। मगर हमारे गाड़ियों के प्रति मोह में कहीं कोई कमी नहीं आई है। फिर भी रोना जारी है कि सरकार तेल की कीमतों पर लगाम क्यों नहीं लगाती।
सब कुछ सरकार ही देखे। हमारा कोई फर्ज नहीं। हमारा काम तो केवल विरोध करने का है। और, वो हम कर ही रहे हैं। यों भी, सरकार के खिलाफ विरोध करना सबसे आसान संघर्ष है। जब किसी पर बस न चले तो सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ जाओ। चाहे तेल के दाम को लेके या बढ़ती महंगाई को लेके। खुद से कुछ नहीं करना। बस विरोध, विरोध और विरोध करना है।
या तो हम बहुत नादान हैं या फिर निरे मूर्ख। तेल में आई महंगाई को हम पॉजिटिव रूप में क्यों नहीं लेते। तेल के दाम बढ़ाए ही इसलिए गए हैं ताकि हम फिर से साइकिल पर लौट सकें। पैदल चलने को आदत में ला सकें। अपने ऊपर से तेल के खर्च का अतिरिक्त बोझ कम कर सकें। मोटर-स्कूटर न चलाकर वातावरण में प्रदूषण न फैला सकें। पर लोग हैं कि समझने को तैयार नहीं। विरोध करने पर उतारू हैं। जबकि यह बात वे भी अच्छे से जानते हैं कि विरोध करने से होना-हवाना कुछ नहीं है। खामख्वाह एक्स्ट्रा एनर्जी ही खर्च होगी।
जो लोग हर समय विरोध करने पर उतारू रहते हैं उन्हें मेरी- अगर मानें तो- सलाह है कि तेल के बढ़ते दामों का विरोध न करें। कोई फायदा नहीं। अगर करना ही है तो अपने घर में गाड़ियां कम कर लें। साइकल खरीद लें। फिर न तेल की फिक्र रहेगी न सरकार को कोसने में ऊर्जा ही नष्ट होगी।
एक दफा करके तो देखें।







