डॉ दिलीप अग्निहोत्री
शिक्षा व परीक्षा दोनों ही आवश्यक है,लेकिन इतने मात्र से जीवन की सिद्धि नहीं हो सकती। भारतीय चिंतन में धर्म अर्थ काम मोक्ष का उल्लेख है। इसी के साथ अविद्या की भी चर्चा की गई। किताबी ज्ञान जीवन का एक पहलू मात्र है। यह सर्वस्व नहीं है। शिक्षा परीक्षा साधन हो सकती है,लेकिन यह साध्य नहीं है। इसके लिए सकारात्मक विचार का होना आवश्यक है।
निराशायाम समम् पापम
मानवस्य न विद्यते
ताम समूलं समुतसार्थ
हराष्वादम प्ररोभव।।
अर्थात निराशा के समान कोई पाप नहीं है। आशावादी होकर ही कर्म करना चाहिये।
गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
विद्यार्थियों को इसी सकारात्मक भाव से ही परीक्षा देनी चाहिए।
गोपाल दास नीरज की कविता भी इस संदर्भ में प्रासंगिक है

छिप छिप अश्रु बहाने वालो !
मोती व्यर्थ बहाने वालो !
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी भाव के अनुरूप देश के बच्चों को प्रेरणा देते है,उन्हें जागरूक बनाते है। मन की बात के माध्यम से वह पहले भी इस प्रकार का सन्देश देते रहे है। 2018 में उन्होंने ताल कटोरा स्टेडियम नई दिल्ली से विद्यार्थियों के साथ संवाद किया था।
परीक्षा पे चर्चा वस्तुतः भारतीय चिंतन के आशावादी दृष्टिकोण के अनुरूप होती है। नरेंद्र मोदी ने कहा कि परीक्षा एक कसौटी मात्र है। इसमें स्वयं की परख करनी चाहिए। परीक्षा अंतिम अवसर नहीं होती। बल्कि यह जिंदगी जीने के लिए अपने आपको कसने का एक उत्तम अवसर है। समस्या तब आती है जब एग्जाम को ही जैसे जीवन के सपनों का अंत मान लेत हैं। यह जीवन मरण का प्रश्न नहीं बल्कि जीवन को गढ़ने का एक अवसर मात्र है।
अभिभावक की तरह प्रधानमंत्री ने कहा कि खाली समय को खाली मत समझिए,यह खजाना है, एक सौभाग्य है, अवसर है। आपकी दिनचर्या में खाली समय के पल होने ही चाहिए, वरना तो जिंदगी एक रोबोट जैसी हो जाती है। जब आप खाली समय में अर्न करते हैं तो आपको उसकी सबसे ज्यादा वैल्यू पता चलती है। जिंदगी में बहुत पड़ाव आते हैं। परीक्षा एक छोटा सा पड़ाव है। इसके लिये दबाव नहीं बनाना चाहिए। ऐसा माहौल बना दिया है कि यही एग्जाम सब कुछ है। जबकि यह जिंदगी का अंतिम मुकाम नहीं है।







