जी के चक्रवर्ती
कभी-कभी लिखने बैठो तो दिमाग बिल्कुल शून्य सा हो जाता है क्या लिखे किस पर लिखे क्यों लिखे जैसे अनेक बातें दिलो दिमाग में उठने लगती हैं, लेकिन मेरे हिसाब से लिखा उन्ही चीजों पर जाना चाहिये जो जनमानस के बिल्कुल नजदीक से ताल्लुक रखने वाला हो और जिससे पढ़ने वाले व्यक्ति को कुछ हासिल हो सके या लोगों के मस्तिष्क में उसे पढ़ कर कुछ नये विचार और कुछ नयी बातों को सीखने या जानने को मिले।
हमारी इस पृथ्वी पर मनुष्य ही केवल एक मात्र ऐसा प्राणी है जो अन्य किसी भी प्राणियों से सर्वश्रेष्ट होने के साथ ही साथ इस पृथ्वी के अन्य प्राणियों की अपेक्षा मानवीय मस्तिष्कीय शक्ति अधिक विकसित है। हम मनुष्यों के पास सामाजिक ज्ञान के अलावा चेतना पूर्ण मस्तिष्क है हम अपने ज्ञान का उपयोग देश को उच्च शिखर पर ले जाने के लिए सेवा भाव से इसका उपयोग करें तो तभी देश की छवि विश्व पटल पर सर्वोच्च स्थान पर पहुंचाने में कामयाब होंगे।
कोई भी राष्ट्र हिंसा एवं जनमानस के मध्य आतंक फैला कर इस स्थान को प्राप्त नहीं कर सकता है, इसके उदाहरण स्वरूप यदि हम अपने पडोसी देश को ही लें तो हमें यह देखने को मिलता हैं कि उनकी प्यास आखिर खून से ही क्यों बुझती है? खून से प्यास तो पिशाचों की बुझती है न कि मनुष्यों की और कोई अगर ऐसा करता है तो फिर वह पशु न होकर पिशाच ही हो सकता है।
इसी तरह नागरिकता संसोधन कानून के विरोध की आड़ में सरकार विरोधी तत्व जनता में भ्रम फैलाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। इसलिए देश के सभी राजनीतिक दलों को जनता के बीच जाकर हिंसा को रोकने का प्रयास अवश्य करना चाहिए था लेकिन इसके उल्ट वे इसे और हवा देने की कोशिश कर रहे हैं, हिंसा को रोकने का दायित्व जितना सत्तासीन सरकार का है उतना ही दायित्व विरोधी पार्टियों और हम सभी देश वासियों का भी है क्योंकि यह देश केवल सरकार का ही नहीं वल्कि हम सभी का देश हैं और यहाँ के सभी बाशिंदें भारत के वासी हैं। यहाँ के किसी भी राजनीतिक पार्टी को अराजकता फ़ैलाने जैसा काम करके देश की जनता को उसकाने जैसी हरकत नहीं करना चाहिए।
हम भारतीय लोगों को किसी भी सरकार विरोधी तत्वों के बहकावे में आकर समाज के लोगों के मध्य भय एवं आतंक का माहौल का निर्माण नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसी हरकतें मात्र देश के अन्दर माहौल बिगड़ने का ही काम करते हैं। जब से देश में नागरिकता संसोधन कानून का एलान किया गया है उस वक्त से लगातार देश भर में इसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं जबकि नागरिकता संसोधन कानून में अफगानिस्तान ,बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रताड़ित होने वाले अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात कही गयी है बाकि समस्त भारतीय सुरक्षित है।
नागरिकता संसोधन कानून नागरिकों के हित के लिए बनाया गया है। देश में अराजकता फैला कर सरकारी संपत्ति को नुक्सान पंहुचा कर उसे केवल सरकार को नुकसान पहुंचाने वाली बात तो कहीं से वजीफ दिखाई नहीं देती है, बल्कि सरकारी संपत्ति में हम प्रत्येक देश वासियों के खून पसीने की कमाई होती है इसलिये हम खुद अपने घर के सभी चीजों को नुकसान पहुंचा कर क्या हम घर के सुसंस्कृत सदस्य कहलाने योग्य हैं? फिर तो हम भारत के नागरिक कहलाने योग्य ही नहीं है।
भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी बात शांति पूर्ण तरीके से रखने का अधिकार है, न की उदंडता पूर्वक समानो से लेकर इंसानो के जान माल तक को नेस्तनाबूत कर के एक सभ्य भारतीय कहलाने के हक़ को खुद ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। प्रत्येक भारतीय चाहे वह किसी भी जाती धर्म से ताल्लुक रखने वाला व्यक्ति हो उसे ऐसी कोई हिंसक प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता ही नहीं होना चाहिये जिससे हमारे धर्म निरपेक्षता होने जैसी बात पर आंच आये। भारत एक धर्म निरपेक्ष देश होने के नाते इसमें प्रत्येक धर्मों के लोगों को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने का अधिकार है।
हिंसात्मक प्रदर्शन और उदंडता पूर्ण क्रियाकालापें इंसानियत का वीभत्स रूप है। समाज वहशीपन का शिकार होता चला जा रहा है। नागरिकता संसोधन कानून को आधार बनाकर हिंसात्मक कार्यवाही भारतीय संस्कृति के खिलाफ है जबकि भारतीय संस्कृति की तारीफ विश्व स्तर पर होती है। संस्कृति का विस्तार राष्ट्रीय होता है। संस्कृति रूपी आत्मा सभ्यता रूपी शरीर धारण किये हुए है। संस्कृति ही किसी भी राष्ट्र की आधारशिला है। सभ्यता नागरिक के व्यवहार करने के तौर तरीकों से बनती है। किसी भी समाज को सभ्य बनने में हजारों वर्ष लगे होंगे उसे मात्र अपने दुष्कर्मो से कलंकित न करें।






